परिचय
भारतीय संविधान एक जीवंत और गतिशील दस्तावेज है, जिसे बदलती राजनीतिक, भौगोलिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया गया है। 9वां संविधान संशोधन अधिनियम 1960 इस लचीलेपन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह संशोधन भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा विवादों के समाधान हेतु हुए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते को लागू करने के लिए पारित किया गया था। यह संशोधन दर्शाता है कि किस प्रकार संवैधानिक प्रावधान विदेश नीति, क्षेत्रीय संप्रभुता और संघीय सिद्धांतों से जुड़े होते हैं। संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं की दृष्टि से यह संशोधन क्षेत्र के परित्याग और संसद की भूमिका को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
1947 में स्वतंत्रता और विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कई सीमा विवाद उत्पन्न हुए। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर कई एन्क्लेव तथा प्रतिकूल कब्जे वाले क्षेत्र मौजूद थे। ये ऐसे भूभाग थे जो एक देश के स्वामित्व में थे लेकिन दूसरे देश की सीमा से घिरे हुए थे।
इन समस्याओं के समाधान हेतु 1958 में भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बीच नेहरू नून समझौता हुआ। इस समझौते के तहत कुछ एन्क्लेवों के आदान प्रदान तथा सीमा के समायोजन का प्रस्ताव रखा गया। चूंकि इसमें भारत के कुछ भूभाग को पाकिस्तान को सौंपने का प्रश्न था, इसलिए इसकी संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठा।
राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा। 1960 के बेरुबारी संघ प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी विदेशी देश को भारतीय क्षेत्र का परित्याग अनुच्छेद 3 के अंतर्गत साधारण कानून द्वारा नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन आवश्यक है। इसी निर्णय के आधार पर 9वां संविधान संशोधन अधिनियम 1960 पारित किया गया।
वर्तमान परिदृश्य
यद्यपि 9वां संशोधन 1960 में पारित हुआ, इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। बाद में भारत बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते को लागू करने हेतु 100वां संविधान संशोधन अधिनियम 2015 पारित किया गया, जिसमें भी इसी संवैधानिक सिद्धांत का पालन किया गया। वर्तमान में सीमा प्रबंधन, सीमा अवसंरचना और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर चर्चा के दौरान संसद की भूमिका और संवैधानिक प्रक्रिया का महत्व रेखांकित किया जाता है।
सरकारी नीतियां और कानूनी प्रावधान
9वां संविधान संशोधन अधिनियम 1960 के माध्यम से संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन किया गया, जिसमें राज्यों और उनके क्षेत्रों का उल्लेख है। इसके माध्यम से पश्चिम बंगाल की सीमा में परिवर्तन कर कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान को सौंपा गया।
प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ घोषित करता है और उसके क्षेत्र का वर्णन करता है।
अनुच्छेद 3 संसद को राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन का अधिकार देता है, परंतु यह विदेशी राज्य को क्षेत्र सौंपने पर लागू नहीं होता।
अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
बेरुबारी प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विदेशी राज्य को क्षेत्र सौंपने के लिए संविधान संशोधन अनिवार्य है।
चुनौतियां और मुद्दे
पहला, संप्रभुता और कूटनीति के बीच संतुलन बनाना।
दूसरा, संघीय ढांचे पर प्रभाव और राज्यों की सहमति का प्रश्न।
तीसरा, स्थानीय जनता की भावनाएं और राष्ट्रीय हित।
चौथा, कानूनी स्पष्टता और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन।
पांचवां, एन्क्लेवों में रहने वाले लोगों के नागरिक अधिकार और पुनर्वास।
आगे की राह
सीमा विवादों के समाधान में पारदर्शिता और संसदीय स्वीकृति सुनिश्चित की जानी चाहिए।
प्रभावित नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और उचित पुनर्वास पर बल दिया जाना चाहिए।
कूटनीतिक समाधान राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय स्थिरता पर आधारित होने चाहिए।
सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासनिक और अवसंरचनात्मक सुदृढ़ीकरण आवश्यक है।
परीक्षा के लिए महत्व
प्रारंभिक परीक्षा के लिए
1 वर्ष 1960
2 नेहरू नून समझौते का कार्यान्वयन
3 प्रथम अनुसूची में संशोधन
4 बेरुबारी संघ प्रकरण 1960
5 अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन
6 अनुच्छेद 3 से भिन्न प्रावधान
7 पाकिस्तान को क्षेत्र का हस्तांतरण
मुख्य परीक्षा के लिए
1 क्षेत्र के परित्याग की संवैधानिक प्रक्रिया का विश्लेषण।
2 विदेश नीति और संविधान के बीच संबंध।
3 संसद और न्यायपालिका की भूमिका।
4 संघीय ढांचे पर प्रभाव।
साक्षात्कार के लिए
1 संवैधानिक प्रक्रिया राष्ट्रीय निर्णयों को वैधता प्रदान करती है।
2 कूटनीति और संप्रभुता में संतुलन आवश्यक है।
3 शांतिपूर्ण सीमा समाधान लोकतांत्रिक परिपक्वता दर्शाता है।
संक्षेप में
9वां संविधान संशोधन अधिनियम 1960 भारत द्वारा पाकिस्तान के साथ सीमा समझौते को लागू करने हेतु पारित किया गया था। इसने स्पष्ट किया कि विदेशी देश को भारतीय क्षेत्र सौंपने के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है। यह संशोधन संप्रभुता, कूटनीति और संवैधानिक प्रक्रिया के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।
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