पृष्टभूमि
संविधान (चौथा
संशोधन) अधिनियम, 1955, 27 अप्रैल 1955 को गठित हुआ था। इस संशोधन
ने भारत के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31, 31A और 305 में महत्वपूर्ण
बदलाव किए तथा नौवां अनुसूची (Ninth Schedule) में कुछ कानूनों को शामिल
किया।
1950 के दशक में भारत में व्यापक भूमि-सुधार कार्यक्रम चल रहे थे,
जिसमें
जमींदारी प्रथा को समाप्त करना, कृषि भूमि का पुनर्वितरण करना एवं संसाधनों को सामाजिक
न्याय और लोक हित हेतु उपयोग
करना शामिल था। इस संदर्भ में यह संशोधन संपत्ति अधिकारों और राज्य की सामाजिक
नीतियों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए आया।
सामान्य अध्ययन
परीक्षाओं जैसे UPSC या राज्य-पीएससी के दृष्टिकोण से यह संशोधन “संविधान
संशोधन”, “मूल अधिकार → संपत्ति का अधिकार”,
“भूमि सुधार”,
“नौवां अनुसूची”
जैसे टॉपिक्स में बहुत उपयोगी है।
प्रिलिम्स परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- अधिनियम
की तिथि: 27 अप्रैल 1955।
- संशोधित
अनुच्छेद: अनु. 31 (संपत्ति का अधिकार), अनु. 31A (राष्ट्र
या राज्य द्वारा अधिग्रहण या संशोधन के लिए बचाव) और अनु. 305 (राज्य में
व्यापार एवं वाणिज्य संबंध-व्यवस्था) तथा नौवां अनुसूची।
- प्रमुख
उद्देश्य: राज्य को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए निजी संपत्ति
अधिग्रहण में सक्षम बनाना एवं भूमि-सुधार जैसे सामाजिक-कल्याण कानूनों को
न्यायिक चुनौती से सुरक्षा प्रदान करना।
प्रमुख प्रावधान एवं मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 31
का संशोधन – अनुच्छेद 31 में
उप-अनुच्छेद (2) को प्रतिस्थापित किया गया कि: “कोई संपत्ति जब्त या
अधिग्रहित नहीं की जाएगी सिवाय सार्वजनिक उद्देश्य के लिए और कानून द्वारा
जिसमें मुआवज़ा देने का प्रावधान हो … और उस कानून को इस आधार पर किसी
न्यायालय में चुनौती नहीं दी जाएगी कि मुआवज़ा पर्याप्त नहीं है।”
साथ ही नया उप-अनुच्छेद (2A) जोड़ा गया कि: “जहाँ कोई कानून संपत्ति का स्वामित्व या अधिकार राज्य या राज्य-नियंत्रित निगम को नहीं देता, तब उसे संपत्ति अधिग्रहण या जब्ती नहीं माना जाएगा, भले ही किसी व्यक्ति की संपत्ति छीन ली गई हो।”
इसका अर्थ यह हुआ कि केवल नियामक कानून द्वारा संपत्ति अधिकार छीनने (पर स्वामित्व न लेने) को अधिग्रहण नहीं माना जाएगा। - अनुच्छेद 31A
का संशोधन – अनु. 31A का दायरा
बढ़ाया गया ताकि भूमि-सुधार, कृषि भूमि अधिग्रहण, राज्य प्रबंधन,
कंपनियों का विलय, खनन लीज़ रद्द करना
आदि प्रकार के कानूनों को चुनौती से बचाया जा सके।
इसके साथ ही कुछ केंद्र एवं राज्य कानूनों को Ninth Schedule में शामिल किया गया (उदाहरण स्वरूप : बिहार विस्थापित व्यक्तियों पुनर्वास (भूमि अधिग्रहण) अधिनियम 1950; यूपी लैंड अधिग्रहण (शरणार्थियों का पुनर्वास) अधिनियम 1948; विस्थापित व्यक्तियों पुनर्वास (भूमि अधिग्रहण) अधिनियम 1948) जिनके एंट्री 14, 15, 16 हैं। - अनुच्छेद 305
का संशोधन – यह स्पष्ट किया गया कि
राज्य द्वारा व्यापार या वाणिज्य में एकाधिकार
स्थापित करने वाले कानून सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं होंगे कि वे अनु. 301
(व्यापार स्वाधीनता) को प्रभावित करते हैं। इस तरह
राज्य को सार्वजनिक हित में उद्योग व व्यापार नियंत्रित करने का अधिकार मिला।
- नौवां
अनुसूची में वृद्धि – भूमि-सुधार और सामाजिक-कल्याण संबंधी कानूनों को Ninth
Schedule में शामिल किया गया ताकि वे मूल अधिकारों के आधार पर
चुनौती मूल न हों।
महत्व
- इस संशोधन
ने राज्य को निजी संपत्ति अधिग्रहित करने, भूमि-सुधार कानून लागू
करने एवं लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं से बचने की संवैधानिक शक्ति दी, जो उस समय
ग्रामीण भारत में ज़रूरी थीं।
- यह
सामाजिक न्याय तथा लोककल्याण को संपत्ति-स्वामित्व के प्राथमिक अधिकारों से
ऊपर रखता है, और संविधान के निर्देशात्मक सिद्धांतों (Directive
Principles) के अनुरूप है।
- यह अद्भुत
उदाहरण है कि संविधान समय-समय पर समाज-आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को
ढालने में सक्षम है।
- परीक्षा-दृष्टि
से यह संपत्ति के अधिकार (जो आगे जाकर मूल अधिकार नहीं रहा) की प्रगति को
समझने में मदद करता है।
- यह Ninth
Schedule के माध्यम से सामाजिक-कल्याण कानूनों को न्यायिक
चुनौती से सुरक्षित करने के तंत्र को भी उजागर करता है।
आलोचनाएँ या सीमाएँ
- आलोचकों
के अनुसार, मुआवज़े को न्यायालयीय समीक्षा से बाहर करना (अनु. 31
के अधीन कानून को चुनौती न दी जा सके) व्यक्तिगत
संपत्ति-अधिकार को कमजोर करता है और राज्य-पक्ष में संतुलन बहुत झुका जाता
है।
- अनु. 31A
के तहत कानूनों को व्यापक संरक्षण देना और Ninth
Schedule में शामिल करना न्यायिक समीक्षा को सीमित कर देता है,
जिससे राज्य के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ सकता है।
- भले ही
भूमि-सुधार में तेजी आई, लेकिन प्रावधानों का कार्यान्वयन अक्सर असमय हुआ और
मुआवज़े विवादित बने रहे; संवैधानिक सुधार मौजूद थे लेकिन ज़मीन पर न्याय की
गारंटी नहीं पूरी हो सकी।
- आगे चलकर,
संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार नहीं रहा (44वां
संशोधन 1978) और अनु. 300A के तहत वैधानिक अधिकार में बदल गया,
यह संकेत है कि Fourth Amendment की पद्धति
को आगे जाकर सुधारने की आवश्यकता पड़ी।
परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु
- वर्ष : 1955
(27 अप्रैल 1955)
- अधिनियम :
संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955
- संशोधित
अनुच्छेद : अनु. 31, 31A, 305
- Ninth
Schedule : 14, 15, 16 (बिहार तथा यूपी-केंद्रित भूमि-अधिग्रहण
पुनर्वास कानून
- उद्देश्य :
राज्य-संपत्ति अधिग्रहण शक्ति बढ़ाना, सामाजिक-कल्याण कानूनों को न्यायिक चुनौती
से सुरक्षित करना, मुआवज़े की समीक्षा को सीमित करना।
- अन्य
संशोधनों के साथ सम्बन्ध : पहला संशोधन 1951 ने Article
31A/B व Ninth Schedule शुरू किया; बाद में 44वां
संशोधन 1978 ने संपत्ति के मूल अधिकार को समाप्त किया।
- पाठ्यक्रम
में प्रासंगिकता : भारतीय संविधान (संशोधन), मूल अधिकार → संपत्ति,
भूमि-सुधार, नौवाँ अनुसूची, राजनीति व शासन → न्यायिक समीक्षा,
केंद्र-राज्य संबंध।
संक्षिप्त में
संविधान (चौथा
संशोधन) अधिनियम, 1955 ने राज्य को निजी संपत्ति अधिग्रहित करने की संवैधानिक
शक्ति दी और भूमि-सुधार कानूनों को न्यायिक चुनौती से सुरक्षित कर सामाजिक-कल्याण
को प्राथमिकता दी। यह संपत्ति-अधिकार तथा सार्वजनिक-उद्धेश्य के बीच संतुलन का एक
महत्वपूर्ण पड़ाव है।
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