परिचय

भारतीय संविधान समय समय पर संशोधनों के माध्यम से संस्थागत प्रक्रियाओं को परिष्कृत करता रहा है। 12वां संविधान संशोधन अधिनियम 1962 भारतीय संवैधानिक विकास का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसके माध्यम से गोवा, दमन और दीव को औपचारिक रूप से भारतीय संघ में केंद्र शासित प्रदेश के रूप में सम्मिलित किया गया। यह संशोधन राष्ट्रीय संप्रभुता के सुदृढ़ीकरण और उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद क्षेत्रीय एकीकरण का संवैधानिक उदाहरण है। संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में यह विषय सामान्य अध्ययन द्वितीय पत्र के अंतर्गत संघीय ढांचे, संविधान संशोधन और केंद्र शासित प्रदेशों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक संदर्भ

स्वतंत्रता के पश्चात अधिकांश रियासतों का भारत में विलय हो गया, किंतु गोवा, दमन और दीव पुर्तगाली शासन के अधीन बने रहे। कूटनीतिक प्रयासों के असफल होने पर दिसंबर 1961 में ऑपरेशन विजय के माध्यम से इन क्षेत्रों को मुक्त कराया गया।

मुक्ति के पश्चात इन क्षेत्रों की संवैधानिक स्थिति निर्धारित करना आवश्यक था। अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ घोषित करता है। प्रथम अनुसूची में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची दी गई है। चूंकि गोवा, दमन और दीव इस सूची में शामिल नहीं थे, इसलिए अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन आवश्यक था।

12वें संविधान संशोधन अधिनियम 1962 द्वारा प्रथम अनुसूची में संशोधन कर इन क्षेत्रों को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में सम्मिलित किया गया।

संवैधानिक प्रावधान और विधिक परिवर्तन

यह संशोधन अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया के अंतर्गत पारित किया गया। प्रासंगिक अनुच्छेद निम्न हैं

अनुच्छेद 1 भारत के क्षेत्र को परिभाषित करता है।
अनुच्छेद 2 नए राज्यों के प्रवेश या स्थापना से संबंधित है।
अनुच्छेद 3 राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन से संबंधित है।
अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रदान करता है।
अनुच्छेद 239 केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन से संबंधित है।

संशोधन से पूर्व ये क्षेत्र संविधान की प्रथम अनुसूची में सूचीबद्ध नहीं थे। संशोधन के पश्चात इन्हें औपचारिक संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई। बाद में 1987 में गोवा को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।

समकालीन प्रासंगिकता

आज गोवा एक पूर्ण राज्य है, जबकि दमन और दीव का विलय दादरा और नगर हवेली के साथ किया जा चुका है। राज्यों के पुनर्गठन और केंद्र शासित प्रदेशों के पुनर्संरचना जैसे विषय वर्तमान में भी संवैधानिक विमर्श का हिस्सा हैं। यह संशोधन दर्शाता है कि किसी भी क्षेत्रीय परिवर्तन को संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से नियमित करना आवश्यक है।

यूपीएससी परिप्रेक्ष्य से विश्लेषण

यह संशोधन संघीय लचीलेपन का उदाहरण है। संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत क्षेत्रीय परिवर्तन को वैधता प्रदान करती है। यह संवैधानिक नैतिकता और संसदीय प्रक्रिया के महत्व को दर्शाता है।

चुनौतियां और मुद्दे

केंद्र और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच संतुलन।
प्रशासनिक समेकन।
आर्थिक विकास।
सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण।
राज्यत्व की मांगों का प्रबंधन।

आगे की राह

सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना।
स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाना।
संवैधानिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना।

परीक्षा के लिए महत्व

प्रारंभिक परीक्षा के लिए

1 वर्ष 1962
2 गोवा, दमन और दीव का समावेशन
3 प्रथम अनुसूची में संशोधन
4 अनुच्छेद 368 के अंतर्गत पारित
5 1961 में मुक्ति के पश्चात
6 केंद्र शासित प्रदेश का गठन
7 1987 में गोवा को राज्य का दर्जा
8 अनुच्छेद 1, 2, 3 से संबंधित
9 अनुच्छेद 239 के अंतर्गत प्रशासन
10 क्षेत्रीय एकीकरण का उदाहरण

मुख्य परीक्षा के लिए

1 क्षेत्रीय एकीकरण की संवैधानिक प्रक्रिया पर चर्चा कीजिए।
2 संघीय ढांचे में केंद्र शासित प्रदेशों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
3 अनुच्छेद 2 और 3 की तुलना कीजिए।
4 अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन प्रक्रिया का महत्व।
5 राज्यत्व की मांग और संघीय संतुलन।

साक्षात्कार के लिए

1 संवैधानिक प्रक्रिया राष्ट्रीय एकता को वैधता प्रदान करती है।
2 संघीय लचीलापन भारत की शक्ति है।
3 लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आवश्यक है।
4 संशोधन प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

प्रश्न पैटर्न विश्लेषण

यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में वर्ष, अनुच्छेद और संशोधन संख्या पूछी जाती है। मुख्य परीक्षा में संघीय प्रभाव और संवैधानिक सिद्धांतों पर चर्चा कराई जाती है। राज्य लोक सेवा आयोग अधिकतर तथ्यात्मक प्रश्न पूछते हैं। सामान्य भ्रम अनुच्छेद 2 और 3 के बीच अंतर को लेकर होता है।


संक्षेप में

12वां संविधान संशोधन अधिनियम 1962 ने गोवा, दमन और दीव को भारतीय संघ में सम्मिलित किया। यह प्रथम अनुसूची में संशोधन के माध्यम से पारित हुआ। यह संशोधन क्षेत्रीय एकीकरण और संघीय लचीलेपन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।