परिचय
संविधान का आठवां संशोधन 1960 भारत के संवैधानिक विकास में सामाजिक न्याय और राजनीतिक समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण को दर्शाता है। स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक वर्षों में यह स्पष्ट हो गया था कि केवल विधिक समानता से ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की स्थिति में वास्तविक सुधार संभव नहीं है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों तथा आंग्ल भारतीय समुदाय के लिए विधायिकाओं में विशेष प्रतिनिधित्व की अवधि को आगे बढ़ाना था। यह संशोधन संविधान के उस व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ा है जो समानता के साथ साथ न्यायपूर्ण अवसर उपलब्ध कराने पर बल देता है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ
1950 में संविधान लागू होते समय संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया था कि सदियों की सामाजिक विषमता को समाप्त करने के लिए अस्थायी सुरक्षात्मक प्रावधान आवश्यक होंगे। इसी कारण लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण तथा आंग्ल भारतीय समुदाय के लिए नामांकन की व्यवस्था की गई। अनुच्छेद 334 के अंतर्गत इन प्रावधानों की अवधि दस वर्ष निर्धारित की गई थी जो 1960 में समाप्त होनी थी। किंतु पहले दशक के अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन अभी भी बना हुआ है और राजनीतिक भागीदारी पूरी तरह सुदृढ़ नहीं हो पाई है। इसी ऐतिहासिक संदर्भ में आठवां संशोधन लाया गया जिसने इन प्रावधानों को 1970 तक बढ़ा दिया।

वर्तमान परिदृश्य
यद्यपि आठवां संशोधन ऐतिहासिक प्रकृति का है लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। बाद के वर्षों में इसी प्रकार के कई संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से आरक्षण की अवधि को आगे बढ़ाया गया। वर्तमान समय में प्रतिनिधित्व से संबंधित आंकड़े यह दर्शाते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति की उपस्थिति विधायिकाओं में बढ़ी है लेकिन सामाजिक आर्थिक संकेतकों में असमानता अब भी विद्यमान है। आठवां संशोधन इस बात का प्रारंभिक संकेत था कि संरचनात्मक असमानताओं से निपटने के लिए दीर्घकालिक संवैधानिक समर्थन आवश्यक है।

सरकारी नीतियां और कानूनी प्रावधान
संविधान आठवां संशोधन अधिनियम 1959 जो 1960 में प्रभावी हुआ ने अनुच्छेद 334 में संशोधन किया। इसके माध्यम से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विधायिकाओं में आरक्षण तथा आंग्ल भारतीय समुदाय के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की अवधि दस वर्ष के लिए बढ़ाई गई। इस संशोधन ने किसी नए लाभार्थी वर्ग को शामिल नहीं किया बल्कि मौजूदा प्रावधानों को सुदृढ़ किया। यह संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में निहित सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप था।

चुनौतियां और मुद्दे
पहली चुनौती अस्थायी प्रावधानों की निरंतरता से जुड़ी है क्योंकि बार बार विस्तार से उनकी अस्थायी प्रकृति पर प्रश्न उठते हैं। दूसरी चुनौती यह है कि मात्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वास्तविक सशक्तिकरण सुनिश्चित नहीं होता। तीसरी समस्या विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच समानता की धारणा को लेकर उत्पन्न होने वाले मतभेद हैं। चौथी चुनौती अनुसूचित जाति और जनजाति के भीतर आंतरिक असमानताओं की है। पांचवीं चुनौती यह है कि यदि सामाजिक और आर्थिक सुधार साथ साथ न हों तो संवैधानिक विस्तार सीमित प्रभाव डाल सकता है।

आगे की राह
भविष्य की रणनीति में राजनीतिक आरक्षण के साथ साथ शिक्षा स्वास्थ्य और आजीविका के अवसरों को मजबूत करना आवश्यक है। समय समय पर तथ्य आधारित समीक्षा से यह आकलन किया जाना चाहिए कि इन प्रावधानों का वास्तविक प्रभाव क्या है। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में विविध प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित कर आंतरिक असमानताओं को कम किया जा सकता है। समावेशी संस्थागत ढांचे के माध्यम से दीर्घकाल में समानता के संवैधानिक लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

परीक्षाओं के लिए महत्व

प्रारंभिक परीक्षा के लिए
आठवां संवैधानिक संशोधन 1959 में पारित हुआ और 1960 में लागू हुआ
इसने संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन किया
इसने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की अवधि बढ़ाई
इसने आंग्ल भारतीय समुदाय के विशेष प्रतिनिधित्व को जारी रखा
विस्तार की अवधि दस वर्ष थी
इसने किसी नए आरक्षण वर्ग को शामिल नहीं किया
यह सामाजिक न्याय की निरंतर आवश्यकता को दर्शाता है

मुख्य परीक्षा के लिए
यह संशोधन भारतीय संविधान के व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है
यह सामाजिक वास्तविकताओं के अनुसार संवैधानिक संशोधन की भूमिका को स्पष्ट करता है
यह अस्थायी प्रावधानों की सीमाओं को रेखांकित करता है
यह राजनीतिक और वास्तविक सशक्तिकरण के अंतर को समझने में सहायक है
यह आरक्षण नीति के विकास का अध्ययन प्रस्तुत करता है

साक्षात्कार के लिए
आठवां संशोधन यह दर्शाता है कि संवैधानिक आदर्शों की प्राप्ति क्रमिक होती है
यह समानता और न्याय के संतुलन को प्रतिबिंबित करता है
इसके विस्तार सामाजिक पिछड़ेपन की निरंतरता को इंगित करते हैं
लोकतंत्र में ऐसे प्रावधानों की समय समय पर समीक्षा आवश्यक है

संक्षेप में
संविधान का आठवां संशोधन 1960 सामाजिक न्याय की अधूरी यात्रा को स्वीकार करते हुए राजनीतिक सुरक्षा को आगे बढ़ाने का प्रयास था। यह समावेशन और लोकतांत्रिक सहभागिता पर आधारित संवैधानिक चिंतन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।