पृष्ठभूमि

  • भारत के संविधान में प्रारंभिक रूप से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों का आबंटन जनसंख्या के आधार पर तय किया गया था।

  • लोकसभा की अधिकतम सीटें 500 निर्धारित थीं, लेकिन सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू होने के बाद यह सीमा अपर्याप्त मानी गई।

  • इस समस्या के समाधान हेतु संसद ने 1952 में द्वितीय संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया।


प्रमुख प्रावधान

  • लोकसभा की अधिकतम सीटें 500 से बढ़ाकर 525 की गईं।

  • राज्य विधानसभाओं की अधिकतम सीटें 350 से बढ़ाकर 500 की गईं।

  • राज्यों का प्रतिनिधित्व लोकसभा में जनसंख्या के आधार पर सुनिश्चित किया गया और आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान रखा गया।

  • संविधान के अनुच्छेद 81 और 170 में आवश्यक संशोधन किए गए।


महत्व

  • भारत की बढ़ती जनसंख्या को संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिला।

  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू होने के बाद लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूती मिली।

  • भविष्य में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की नींव रखी गई।


सीमाएँ / आलोचना

  • यह संशोधन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रहा।

  • जनसंख्या असमानता और परिसीमन से जुड़ी चुनौतियाँ आगे भी बनी रहीं।


परीक्षा के लिए मुख्य तथ्य

  • वर्ष – 1952

  • संबंधित अनुच्छेद – 81 (लोकसभा), 170 (राज्य विधानसभा)

  • लोकसभा सीटें – 500 से बढ़ाकर 525

  • विधानसभा सीटें – 350 से बढ़ाकर 500

  • उद्देश्य – सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू होने के बाद प्रतिनिधित्व में संतुलन लाना


संक्षेप में
द्वितीय संविधान संशोधन अधिनियम, 1952 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाई गई, जिससे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू होने के बाद उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सका।