परिचय
भारतीय संविधान राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए विस्तृत प्रावधान करता है, जिससे सर्वोच्च संवैधानिक पदों की वैधता और निरंतरता सुनिश्चित होती है। 11वां संविधान संशोधन अधिनियम 1961 इन पदों के निर्वाचन से संबंधित प्रक्रियात्मक अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए पारित किया गया था। यह संशोधन तकनीकी प्रकृति का होते हुए भी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं की दृष्टि से यह संशोधन संवैधानिक प्रक्रियाओं की स्पष्टता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
मूल संविधान के अनुसार अनुच्छेद 66 में उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा संयुक्त बैठक में किया जाना था। व्यवहार में यह प्रक्रिया जटिल और अनावश्यक रूप से औपचारिक मानी गई। दोनों सदनों के सदस्य बिना संयुक्त बैठक के भी मतदान कर सकते थे।
साथ ही यह प्रश्न भी उठा कि यदि निर्वाचन मंडल में रिक्तियां हों तो क्या राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का निर्वाचन अमान्य माना जाएगा। अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के निर्वाचित सदस्यों और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। ऐसी स्थिति में किसी भी रिक्ति को आधार बनाकर चुनाव को चुनौती दी जा सकती थी।
इन समस्याओं के समाधान हेतु 11वां संविधान संशोधन अधिनियम 1961 पारित किया गया।
वर्तमान परिदृश्य
आज भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का निर्वाचन इसी संशोधित व्यवस्था के अंतर्गत होता है। निर्वाचन आयोग इन चुनावों का संचालन करता है। हाल के वर्षों में हुए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों के दौरान निर्वाचन प्रक्रिया, मत मूल्य और संवैधानिक प्रावधानों पर व्यापक चर्चा हुई है। निर्वाचन मंडल में रिक्तियों के बावजूद चुनाव की वैधता पर कोई प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि 11वें संशोधन ने इस विषय को स्पष्ट कर दिया है।
सरकारी नीतियां और कानूनी प्रावधान
11वें संविधान संशोधन अधिनियम 1961 ने अनुच्छेद 66 में संशोधन कर संयुक्त बैठक की अनिवार्यता समाप्त की और यह स्पष्ट किया कि उपराष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली और एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा गुप्त मतदान से होगा।
इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 71 में संशोधन कर यह स्पष्ट किया गया कि निर्वाचन मंडल में रिक्ति के आधार पर राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती। चुनाव से संबंधित विवादों का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाता है।
प्रमुख अनुच्छेद
अनुच्छेद 54 राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल से संबंधित है।
अनुच्छेद 55 राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति से संबंधित है।
अनुच्छेद 66 उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित है।
अनुच्छेद 71 चुनाव विवादों से संबंधित है।
अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया से संबंधित है।
चुनौतियां और मुद्दे
पहला, अप्रत्यक्ष निर्वाचन में पारदर्शिता बनाए रखना।
दूसरा, संसद और विधानसभाओं में रिक्तियों का प्रबंधन।
तीसरा, सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और न्यायिक संतुलन।
चौथा, नागरिकों में संवैधानिक जागरूकता की कमी।
पांचवां, उच्च पदों की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखना।
आगे की राह
निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
नागरिक शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से संवैधानिक प्रक्रियाओं की समझ बढ़ाई जानी चाहिए।
निर्वाचन कानूनों की समय समय पर समीक्षा आवश्यक है।
संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
परीक्षा के लिए महत्व
प्रारंभिक परीक्षा के लिए
1 वर्ष 1961
2 अनुच्छेद 66 और 71 में संशोधन
3 संयुक्त बैठक की अनिवार्यता समाप्त
4 निर्वाचन मंडल में रिक्ति के आधार पर चुनाव अमान्य नहीं
5 अनुच्छेद 54 राष्ट्रपति निर्वाचन
6 अनुच्छेद 71 चुनाव विवाद
7 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय
मुख्य परीक्षा के लिए
1 11वें संविधान संशोधन का निर्वाचन प्रक्रिया पर प्रभाव।
2 अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली का विश्लेषण।
3 संवैधानिक संशोधन और प्रक्रियात्मक सुधार।
4 सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका।
साक्षात्कार के लिए
1 प्रक्रियात्मक स्पष्टता लोकतंत्र को सुदृढ़ करती है।
2 अप्रत्यक्ष निर्वाचन संघीय संरचना को दर्शाता है।
3 संवैधानिक संस्थाओं की स्थिरता आवश्यक है।
4 न्यायपालिका और विधायिका का संतुलन महत्वपूर्ण है।
संक्षेप में
11वां संविधान संशोधन अधिनियम 1961 ने उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया को सरल बनाया और निर्वाचन मंडल में रिक्ति के आधार पर चुनाव को अमान्य ठहराने की संभावना समाप्त की। इसने सर्वोच्च संवैधानिक पदों की स्थिरता और वैधता को सुदृढ़ किया।
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