परिचय
15वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1963 भारत की उच्च न्यायपालिका की संरचना और दक्षता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया। इसने मुख्य रूप से उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि तथा सर्वोच्च न्यायालय की दीवानी अपीलीय अधिकारिता को तर्कसंगत बनाने से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया। इसका उद्देश्य बढ़ते न्यायिक कार्यभार को संबोधित करना, निर्णय प्रक्रिया में निरंतरता सुनिश्चित करना तथा संवैधानिक व्याख्या की गुणवत्ता को सुदृढ़ करना था। संवैधानिक विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह संशोधन संस्थागत स्थिरता को मजबूत करता है और अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान की अनुकूलन क्षमता को प्रदर्शित करता है।
पृष्ठभूमि और संवैधानिक संदर्भ
संशोधन से पूर्व अनुच्छेद 217 के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष थी। बढ़ते मामलों और जटिल वादों के कारण अनुभवी न्यायाधीशों की आवश्यकता अधिक समय तक बनी रहती थी। अनुच्छेद 133 के अंतर्गत दीवानी अपीलें मुख्यतः मौद्रिक सीमा पर आधारित थीं, जिससे महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर ध्यान सीमित हो जाता था। न्यायिक लंबित मामलों और विधि की एकरूपता सुनिश्चित करने की आवश्यकता ने इस संशोधन को आवश्यक बनाया। बाद की न्यायिक व्याख्याओं ने न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत सुदृढ़ीकरण के महत्व को रेखांकित किया।
संवैधानिक प्रावधान और विधिक परिवर्तन
इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 217 में परिवर्तन कर उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से 62 वर्ष की गई। अनुच्छेद 133 में संशोधन कर दीवानी अपील के लिए मौद्रिक सीमा के स्थान पर सामान्य महत्व के महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न की शर्त जोड़ी गई। अनुच्छेद 124, 128 और 222 में भी संशोधन कर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण से संबंधित प्रावधान स्पष्ट किए गए। संशोधन से पूर्व अपीलें मुख्यतः आर्थिक मूल्य पर आधारित थीं, जबकि संशोधन के पश्चात विधिक सिद्धांतों के महत्व पर बल दिया गया।
समकालीन प्रासंगिकता
यह संशोधन आज भी न्यायिक सुधार, सेवानिवृत्ति आयु और लंबित मामलों की बहस में प्रासंगिक है। उच्च सेवानिवृत्ति आयु न्यायिक निरंतरता को समर्थन देती है। महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न आधारित अपील प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय को व्यापक संवैधानिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायक है।
यूपीएससी विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
ऐसे प्रक्रियात्मक संशोधन संसदीय लोकतंत्र और विधि के शासन को सुदृढ़ करते हैं। यह शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक पुनरावलोकन को मजबूत करता है। संघीय न्यायिक संरचना में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को सुदृढ़ करना इस संशोधन का महत्वपूर्ण पक्ष है। यह संवैधानिक नैतिकता के अनुरूप संस्थागत सुधार का उदाहरण है।
चुनौतियाँ और मुद्दे
सेवानिवृत्ति आयु बढ़ने के बावजूद न्यायिक रिक्तियाँ बनी रहती हैं।
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की आयु समान करने पर बहस जारी है।
न्यायाधीशों के स्थानांतरण की पारदर्शिता पर समय समय पर प्रश्न उठते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय पर मामलों का भार अभी भी अधिक है।
अपील की सुलभता और न्यायिक दक्षता के बीच संतुलन एक चुनौती है।
आगे की राह
न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के बीच समन्वय को मजबूत किया जाना चाहिए। तकनीकी सुधार और ई न्यायालय प्रणाली को विस्तारित किया जाना चाहिए। सभी सुधार संवैधानिक मूल्यों जैसे स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और न्याय तक पहुँच पर आधारित होने चाहिए।
परीक्षा हेतु महत्व
प्रारंभिक परीक्षा हेतु
यह संशोधन वर्ष 1963 में अधिनियमित हुआ।
इसने उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की आयु 62 वर्ष की।
इसने अनुच्छेद 217 में संशोधन किया।
इसने अनुच्छेद 133 में परिवर्तन किया।
इसने महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न का मानक जोड़ा।
इसने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति की अनुमति दी।
इसने सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्ति आयु में कोई परिवर्तन नहीं किया।
मुख्य परीक्षा हेतु
इस संशोधन का विश्लेषण न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत दक्षता के संदर्भ में किया जा सकता है। प्रश्नों में संशोधन से पूर्व और पश्चात अपीलीय व्यवस्था की तुलना करने को कहा जा सकता है। यूपीएससी प्रायः समालोचनात्मक विश्लेषण, चर्चा और तुलना जैसे निर्देशों का उपयोग करता है। पूर्व परीक्षाओं में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, अपीलीय अधिकारिता और संवैधानिक संतुलन से संबंधित विषय बार बार पूछे गए हैं।
साक्षात्कार हेतु
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्ति आयु के अंतर का औचित्य समझाना एक महत्वपूर्ण बिंदु है।
महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न की अवधारणा पर स्पष्टता प्रदर्शित करना आवश्यक है।
न्यायिक अनुभव और उत्तरदायित्व के संतुलन पर संतुलित दृष्टिकोण अपेक्षित है।
पूर्व वर्षों के प्रश्नों की प्रवृत्ति
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में संशोधित अनुच्छेद और आयु से संबंधित तथ्य पूछे जाते हैं। मुख्य परीक्षा में न्यायिक सुधारों के विश्लेषण की अपेक्षा की जाती है। राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं में अनुच्छेद संख्या और वर्ष पर विशेष बल दिया जाता है। सामान्य त्रुटि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की आयु में भ्रम या अन्य संशोधनों से मिश्रण करना है।
संक्षेप में
15वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1963 ने उच्च न्यायपालिका को सुदृढ़ किया।
इसने उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष की।
इसने सर्वोच्च न्यायालय की दीवानी अपीलीय अधिकारिता को महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न के आधार पर तर्कसंगत बनाया।
Comments (0)
Leave a Comment