परिचय
14वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1962 का उद्देश्य पांडिचेरी को औपचारिक रूप से भारतीय संघ में सम्मिलित करना तथा कुछ संघ राज्य क्षेत्रों के शासन हेतु संवैधानिक ढाँचे को सुदृढ़ करना था। इस संशोधन द्वारा प्रथम अनुसूची में संशोधन किया गया तथा अनुच्छेद 239A जोड़ा गया, जिसके माध्यम से कुछ संघ राज्य क्षेत्रों में विधानमंडल और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था का प्रावधान किया गया।
यह संशोधन भारत के संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि संविधान क्षेत्रीय एकीकरण और प्रशासनिक पुनर्गठन को समायोजित करने में सक्षम है। इसने संघ राज्य क्षेत्रों में प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ किया तथा संस्थागत स्थिरता सुनिश्चित की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक संदर्भ
स्वतंत्रता के बाद फ्रांसीसी क्षेत्रों जैसे पांडिचेरी, कराईकल, माहे और यानम का भारत में विलय हुआ। इन क्षेत्रों को संवैधानिक रूप से सम्मिलित करने हेतु प्रथम अनुसूची में संशोधन आवश्यक था।
संशोधन से पूर्व अधिकांश संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन अनुच्छेद 239 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से होता था। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग और प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण एक संवैधानिक प्रावधान की आवश्यकता हुई।
इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 239A जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत संसद को कुछ संघ राज्य क्षेत्रों में विधानमंडल और मंत्रिपरिषद की स्थापना का अधिकार दिया गया।
संवैधानिक प्रावधान और विधिक परिवर्तन
1) प्रथम अनुसूची में पांडिचेरी को संघ राज्य क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया।
2) अनुच्छेद 239A जोड़ा गया, जिससे संसद को निर्दिष्ट संघ राज्य क्षेत्रों के लिए विधानमंडल और मंत्रिपरिषद स्थापित करने का अधिकार मिला।
3) इसने संसद की क्षेत्रीय पुनर्गठन संबंधी शक्तियों को सुदृढ़ किया।
संशोधन से पूर्व प्रत्यक्ष प्रशासन प्रमुख व्यवस्था थी। संशोधन के पश्चात सीमित प्रतिनिधिक शासन की व्यवस्था संभव हुई, यद्यपि अंतिम अधिकार संसद के पास ही रहा।
समकालीन प्रासंगिकता
यह संशोधन बाद के संवैधानिक विकासों का आधार बना, जिनमें कुछ संघ राज्य क्षेत्रों में विशेष व्यवस्थाएँ विकसित हुईं। यह संघवाद, प्रशासनिक स्वायत्तता और शक्तियों के वितरण पर चल रही बहसों को प्रभावित करता है।
यूपीएससी परिप्रेक्ष्य से विश्लेषण
यह संशोधन असममित संघवाद का उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि भारत में विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक ढाँचा संभव है। यह संसदीय सर्वोच्चता और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को स्पष्ट करता है।
चुनौतियाँ और मुद्दे
- प्रशासक और निर्वाचित सरकार के बीच शक्तियों की अस्पष्टता
- पूर्ण राज्य की तुलना में सीमित स्वायत्तता
- छोटे विधानमंडलों में राजनीतिक अस्थिरता
- संसद पर संरचनात्मक निर्भरता
- राज्य का दर्जा देने की मांग
आगे की राह
- विधिक ढाँचे की स्पष्टता
- सहकारी संघवाद को प्रोत्साहन
- स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप संस्थागत सुदृढ़ीकरण
- उत्तरदायित्व और पारदर्शिता में वृद्धि
- राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय आकांक्षाओं में संतुलन
परीक्षा हेतु महत्व
प्रारंभिक परीक्षा हेतु
- वर्ष 1962, प्रथम अनुसूची में संशोधन
- अनुच्छेद 239A जोड़ा गया
- संघ राज्य क्षेत्रों में विधानमंडल की व्यवस्था
- पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं
- संसद की प्रधानता
मुख्य परीक्षा हेतु
- असममित संघवाद पर चर्चा
- संघ राज्य क्षेत्रों के शासन का विकास
- अनुच्छेद 239A का विश्लेषण
- संघीय ढाँचे पर प्रभाव
साक्षात्कार हेतु
- राज्य और संघ राज्य क्षेत्र में अंतर
- संवैधानिक नैतिकता
- राज्य का दर्जा देने पर संतुलित दृष्टिकोण
पूर्ववर्ती प्रश्नों की प्रवृत्ति
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में वर्ष, अनुच्छेद और संशोधन की प्रकृति पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
- मुख्य परीक्षा में संघवाद और प्रशासनिक ढाँचे पर विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
- राज्य लोक सेवा आयोगों में तथ्यात्मक स्पष्टता पर विशेष बल दिया जाता है।
संक्षेप में
- 14वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1962 ने पांडिचेरी को भारतीय संघ में सम्मिलित किया।
इसने अनुच्छेद 239A जोड़ा।
- यह भारत में असममित संघवाद का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
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