पृष्ठभूमि
आच्छादन का सिद्धांत और असंबद्धता का सिद्धांत भारतीय संविधान के दो महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं जो विधायी ढांचे की एकरूपता और संतुलन सुनिश्चित करते हैं। दोनों सिद्धांत अलग-अलग संदर्भों में लागू होते हैं, लेकिन इनका उद्देश्य संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखना है।
आच्छादन का सिद्धांत संविधान लागू होने से पहले बनाए गए कानूनों पर लागू होता है जो मौलिक अधिकारों के साथ असंगत पाए जाते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार ऐसे कानून पूरी तरह शून्य नहीं होते, बल्कि वे तब तक निष्क्रिय रहते हैं जब तक असंगति दूर नहीं हो जाती। यह सिद्धांत संविधान की निरंतरता और सर्वोच्चता दोनों को बनाए रखता है।
दूसरी ओर, असंबद्धता का सिद्धांत केंद्र और राज्य द्वारा समान विषय पर बनाए गए कानूनों के बीच टकराव से संबंधित है। यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय एकरूपता बनी रहे और आवश्यक होने पर केंद्रीय कानून को प्राथमिकता दी जाए।
प्रीलिम्स परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
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आच्छादन का सिद्धांत अनुच्छेद 13(1) के अंतर्गत आता है।
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इसे सर्वप्रथम 1955 के भिखाजी नारायण ढाकरा बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में स्पष्ट किया गया।
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यह मौलिक अधिकारों के साथ असंगत संविधान-पूर्व कानूनों पर लागू होता है।
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ऐसा कानून पूरी तरह शून्य नहीं होता, केवल असंगति तक निष्क्रिय रहता है।
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असंबद्धता का सिद्धांत अनुच्छेद 254 से संबंधित है।
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यह तब लागू होता है जब संसद और राज्य विधानमंडल दोनों समवर्ती सूची के समान विषय पर कानून बनाते हैं।
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टकराव की स्थिति में केंद्र का कानून प्रभावी होता है।
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यदि राज्य का कानून राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर ले, तो वह राज्य में लागू रह सकता है (अनुच्छेद 254(2))।
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दोनों सिद्धांत संविधानिक और संघीय ढांचे में सामंजस्य बनाए रखते हैं।
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प्रमुख मामले – दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959), जावेरभाई बनाम बॉम्बे राज्य (1954)।
मुख्य प्रावधान और प्रमुख तथ्य
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आच्छादन का सिद्धांत
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केवल संविधान-पूर्व कानूनों पर लागू होता है।
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यदि कोई ऐसा कानून मौलिक अधिकारों से असंगत हो, तो वह निष्क्रिय हो जाता है।
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यह कानून पूरी तरह शून्य नहीं होता, बल्कि असंगति समाप्त होने तक ढका रहता है।
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जैसे ही असंगति समाप्त होती है (उदाहरण के लिए, संविधान संशोधन द्वारा), कानून फिर से प्रभावी हो जाता है।
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यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि संविधान-पूर्व कानून अपने समय में वैध थे, इसलिए उन्हें पूर्णतः शून्य नहीं माना जा सकता।
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राज्य बनाम अंबिका मिल्स (1974) मामले में इस सिद्धांत की पुष्टि की गई।
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असंबद्धता का सिद्धांत
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यह केंद्र और राज्य द्वारा समवर्ती सूची के विषयों पर बनाए गए कानूनों से संबंधित है।
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यदि दोनों के बीच प्रत्यक्ष टकराव हो, तो केंद्रीय कानून को प्राथमिकता दी जाती है।
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टकराव की परीक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि क्या दोनों कानून साथ-साथ लागू हो सकते हैं।
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यदि दोनों साथ-साथ लागू नहीं हो सकते, तो राज्य का कानून उस सीमा तक निष्क्रिय हो जाता है।
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यदि राज्य का कानून राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर ले, तो वह राज्य में लागू रह सकता है।
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संसद बाद में उसी विषय पर नया कानून बनाकर पुनः सर्वोच्चता स्थापित कर सकती है।
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यह सिद्धांत राष्ट्रीय हित और विधायी एकरूपता को सुनिश्चित करता है।
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महत्व
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आच्छादन का सिद्धांत संविधान की सर्वोच्चता और कानूनों की निरंतरता को सुनिश्चित करता है।
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यह पुराने कानूनों को पूरी तरह निष्कासित होने से बचाता है और उन्हें सुधार की संभावना देता है।
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यह न्यायिक लचीलापन प्रदान करता है ताकि कानून संशोधन के बाद पुनः लागू हो सकें।
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असंबद्धता का सिद्धांत संघीय संतुलन बनाए रखता है और केंद्र-राज्य के संबंधों में स्पष्टता लाता है।
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यह कानून निर्माण में एकरूपता और स्थिरता बनाए रखता है।
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दोनों सिद्धांत मिलकर शासन व्यवस्था में विधायी सामंजस्य और कानून के शासन को सुदृढ़ करते हैं।
सीमाएँ या आलोचना
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आच्छादन का सिद्धांत केवल संविधान-पूर्व कानूनों पर लागू होता है, बाद के कानूनों पर नहीं।
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यह असंवैधानिक कानूनों को तुरंत अमान्य नहीं करता, जिससे भ्रम की स्थिति बन सकती है।
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असंबद्धता का सिद्धांत कभी-कभी राज्यों की विधायी स्वतंत्रता को सीमित करता है।
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राष्ट्रपति की स्वीकृति पर निर्भरता राज्य की स्वायत्तता को कम कर सकती है।
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केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच असंगति की सीमा तय करना कठिन होता है।
परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु
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अनुच्छेद 13(1): आच्छादन का सिद्धांत
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अनुच्छेद 254: असंबद्धता का सिद्धांत
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प्रमुख मामले:
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भिखाजी नारायण ढाकरा बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955)
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दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959)
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जावेरभाई बनाम बॉम्बे राज्य (1954)
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राज्य बनाम अंबिका मिल्स (1974)
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प्रमुख शब्द: मौलिक अधिकार, संविधान-पूर्व कानून, विधायी टकराव, संघीयता, संवैधानिक सर्वोच्चता
संक्षेप में
आच्छादन का सिद्धांत संविधान-पूर्व कानूनों से संबंधित है जो मौलिक अधिकारों से टकराव के कारण निष्क्रिय हो जाते हैं, जबकि असंबद्धता का सिद्धांत केंद्र और राज्य के बीच विधायी टकराव की स्थिति में लागू होता है। दोनों सिद्धांत संविधानिक सामंजस्य और संघीय संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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