पृष्ठभूमि
संविधान (पांचवां संशोधन) अधिनियम 1955 उस समय लाया गया जब स्वतंत्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन पर गंभीर बहस चल रही थी। संविधान के अनुच्छेद 3 के मूल प्रावधानों के अनुसार संसद को नए राज्य बनाने, सीमाओं, नाम या क्षेत्र में परिवर्तन करने का अधिकार था, लेकिन राज्यों को अपने विचार व्यक्त करने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी।
इस कारण राज्य विधायिकाएं अनिश्चित काल तक अपनी राय व्यक्त कर सकती थीं, जिससे राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया रुक सकती थी। इसे सुधारने के लिए इस संशोधन ने समय सीमा तय करने की व्यवस्था पेश की और यह सुनिश्चित किया कि प्रस्तावित विधेयक उस अवधि की समाप्ति के बाद ही संसद में पेश हो। इस प्रकार यह संशोधन प्रक्रियात्मक था और इसका उद्देश्य राज्य पुनर्गठन की शक्ति को नहीं बदलना बल्कि प्रक्रिया को अधिक सावधानीपूर्वक और समयबद्ध बनाना था।
प्रीलिम्स परीक्षा के लिए तथ्य
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इस संशोधन का आधिकारिक नाम है संविधान (पांचवां संशोधन) अधिनियम 1955।
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इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति 24 दिसंबर 1955 को मिली और अधिसूचना 26 दिसंबर 1955 को राजपत्र में प्रकाशित हुई।
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यह अधिनियम विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 3 की उपप्रावधान (proviso) को बदलने के लिए लाया गया।
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प्रमुख परिवर्तन यह है कि राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वह राज्य विधायिका को अपनी राय व्यक्त करने के लिए अवधि निर्धारित कर सके यदि कोई विधेयक किसी राज्य के क्षेत्र, सीमाओं या नाम को प्रभावित करता हो।
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यदि राज्य उस अवधि या विस्तारित अवधि में जवाब न दे सके, तो संसद उस विधेयक को आगे बढ़ा सकती है।
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यह संशोधन प्रक्रियात्मक है और यह राज्य पुनर्गठन की शक्ति को नहीं बदलता।
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यह संशोधन आगे आने वाले राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 से घनिष्ठ रूप से संबंधित था।
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साथ ही यह स्पष्ट करता है कि विधेयक संसद में प्रस्तावित करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश अनिवार्य होगी।
मुख्य प्रावधान और मुख्य तथ्य
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अधिनियम ने अनुच्छेद 3 में नया उपप्रावधान जोड़ा ताकि यदि कोई विधेयक किसी राज्य के क्षेत्र, सीमाएं या नाम को प्रभावित करता हो तब
a) वह राष्ट्रपति की सिफारिश पर संसद में प्रस्तावित हो।
b) राष्ट्रपति उस विधेयक को संबंधित राज्य विधायिका को अपनी राय व्यक्त करने के लिए निर्दिष्ट अवधि या विस्तारित अवधि के भीतर भेजे।
c) उस अवधि की समाप्ति के बाद ही वह विधेयक संसद में पेश किया जाए। -
उस अवधि को बढ़ाने की शक्ति राष्ट्रपति को दी गई।
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राज्य की राय केवल सलाहात्मक है; संसद उन पर बाध्य नहीं है।
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यह संशोधन संसद की अनुच्छेद 3 के अंतर्गत मूल शक्ति को नहीं बदलता, यह केवल एक प्रक्रिया जोड़ता है।
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इस संशोधन से सुनिश्चित हुआ कि राज्य विधायिकाएं अनिश्चित काल तक विलंब नहीं कर सकतीं और संसद की कार्यवाही बाधित नहीं होती।
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यह संविधान में केंद्र और राज्य के बीच संवाद की अवधारणा को बनाए रखता है और प्रक्रिया को अधिक कारगर बनाता है।
महत्व
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परीक्षा की दृष्टि से यह संशोधन एक प्रक्रियात्मक सुधार है जो राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है और देरी से बचाता है।
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यह भारतीय संविधान की लचीली प्रकृति को दर्शाता है जो देश के महत्वपूर्ण प्रशासनिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने की क्षमता रखती है।
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यह सुनिश्चित करता है कि राज्य विधायिकाएं प्रस्तावित विधेयकों को अनिश्चित काल तक न टाल सकें, जिससे संसद की अनुच्छेद 3 के अंतर्गत शक्ति बनी रहती है।
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इस कानून ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 की पारगमनशीलता में सहायक भूमिका निभाई क्योंकि यह देरी को सीमित करता है और प्रक्रिया को स्पष्ट करता है।
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यह सहकारी संघवाद की अवधारणा को मजबूत करता है, जिससे राज्यों को सलाह देने का अवसर मिलता है लेकिन उन्हें वीटो की शक्ति नहीं दी जाती।
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यह राजनीति और संविधान अध्ययन में अक्सर संशोधन प्रक्रिया, राज्य पुनर्गठन, केंद्र राज्य संबंध जैसे विषयों में उद्धृत किया जाता है।
आलोचना या सीमाएं
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हालांकि राज्यों को सलाह देने का अवसर मिलता है, उनकी राय बाध्यकारी नहीं होती, जिससे राज्यों को यह लग सकता है कि उनके हितों की अनदेखी की गई है।
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राष्ट्रपति को अवधि बढ़ाने की शक्ति देना केंद्रीकरण की दिशा में कदम माना जा सकता है।
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यह न्यूनतम अवधि निर्धारित नहीं करता, जिससे राष्ट्रपति बहुत कम समय सीमा तय कर सकते हैं।
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यह केवल प्रक्रिया से संबंधित है और यह नहीं बताता कि राज्यों के हितों की रक्षा कैसे की जाए।
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व्यवहार में विवाद उत्पन्न हो सकते हैं यदि राज्य विधायिकाओं को यह लगे कि उनकी राय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु
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वर्ष: 1955 (राष्ट्रपति की स्वीकृति 24 दिसंबर 1955)
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संशोधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 3
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संबद्ध अधिनियम या निर्णय:
a) कोई नई अनुसूची नहीं जोड़ी गई।
b) सम्बद्ध कानून: राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956, जैसा कि संशोधित अनुच्छेद 3 के अंतर्गत लागू हुआ।
c) महत्वपूर्ण मामला: बाबूलाल परते बनाम बॉम्बे राज्य (Babulal Parate v. State of Bombay) जिसमें राज्य की राय का प्रश्न उठा था। -
प्रक्रियात्मक विशेषताएं: राष्ट्रपति की समय सीमा निर्धारण शक्ति, विधेयक प्रस्तावित करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश अनिवार्य, राज्य को विचार व्यक्त करने के लिए भेजना।
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पाठ्यक्रम संबंध: यह संशोधन संविधान संशोधन, राज्य पुनर्गठन, केंद्र राज्य संबंध और विधायी प्रक्रिया विषयों में प्रासंगिक है।
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परीक्षा टिप: अनुच्छेद 3 संसद को राज्य सीमाओं पर अधिकार देता है, पर यह संशोधन राज्यों की राय को समयबद्ध बनाता है, न कि बाध्यकारी।
संक्षेप में
यह 1955 का संशोधन अनुच्छेद 3 की परामर्श प्रक्रिया को समयबद्ध बनाता है, जिससे राज्य पुनर्गठन अधिक प्रभावी और कुशल बनता है, जबकि राज्यों को विचार व्यक्त करने का अवसर भी मिलता है।
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