पृष्ठभूमि

1950 में संविधान लागू होने के बाद भारत सरकार को प्रशासनिक और वित्तीय क्षेत्र में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इनमें से एक प्रमुख समस्या थी कि केंद्र और राज्यों दोनों को समान वस्तुओं पर कर लगाने का अधिकार था, विशेष रूप से राज्यों के बीच होने वाली बिक्री या खरीद पर। इससे दोहरे कराधान और राज्यों के बीच विवाद जैसी स्थितियां उत्पन्न हो रही थीं।

इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए संसद ने 1956 में संविधान का छठा संशोधन अधिनियम पारित किया। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य में वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर कर लगाने की शक्ति को स्पष्ट करना था। इसका लक्ष्य पूरे देश में एक समान और व्यवस्थित कर प्रणाली स्थापित करना था।

यह संशोधन कराधान जांच आयोग की सिफारिशों से भी प्रेरित था, जिसने कहा था कि कर कानूनों में समानता राष्ट्रीय आर्थिक एकता के लिए आवश्यक है।


प्रीलिम्स परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  1. अधिनियम पारित होने का वर्ष 1956

  2. राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद

  3. प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू

  4. संशोधन का प्रकार वित्तीय और कराधान संबंधी

  5. संशोधित अनुच्छेद 269 और 286

  6. संसद को अंतरराज्यीय बिक्री कर पर कानून बनाने का अधिकार दिया गया

  7. संघ सूची में नई प्रविष्टि जोड़ी गई प्रविष्टि संख्या 92ए

  8. केंद्र और राज्यों के बीच राजकोषीय समन्वय को मजबूत किया गया


मुख्य प्रावधान और प्रमुख तथ्य

  1. अनुच्छेद 269 में संशोधन
    इस संशोधन ने अनुच्छेद 269 में बदलाव किया ताकि अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य में वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर कर केंद्र सरकार द्वारा लगाया और संग्रहित किया जा सके, लेकिन आय संबंधित राज्यों को दी जा सके।

  2. अनुच्छेद 286 में संशोधन
    इसमें यह स्पष्ट किया गया कि कोई राज्य ऐसी बिक्री या खरीद पर कर नहीं लगा सकता जो राज्य के बाहर हुई हो या जो आयात या निर्यात के दौरान हुई हो। इससे राज्यों को अंतरराज्यीय व्यापार पर कर लगाने से रोका गया।

  3. संघ सूची में प्रविष्टि 92ए जोड़ना
    संघ सूची की सातवीं अनुसूची में नई प्रविष्टि 92ए जोड़ी गई, जिसने संसद को अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य में वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर कर से संबंधित कानून बनाने की शक्ति दी।

  4. बिक्री कर प्रणाली में समानता
    संशोधन ने राज्यों के बीच कर प्रणाली में एकरूपता लाकर एक ही वस्तु पर कई बार कर लगाने की स्थिति समाप्त की।

  5. कराधान अधिकारों की स्पष्टता
    इसने यह स्पष्ट किया कि किस स्तर की सरकार केंद्र या राज्य को कौन से कर लगाने का अधिकार है, विशेषकर उन मामलों में जहां व्यापार राज्य सीमाओं को पार करता है।


महत्व

  1. इस संशोधन ने केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय स्पष्टता और समन्वय बढ़ाया।

  2. दोहरे कराधान को समाप्त किया और व्यापार को निष्पक्ष बनाया।

  3. भारत की आर्थिक एकता को सुदृढ़ किया।

  4. राष्ट्रीय कर ढांचे की नींव रखी जो बाद में वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी के रूप में विकसित हुआ।

  5. अंतरराज्यीय व्यापार से जुड़े कानूनी विवादों और भ्रम को कम किया।


सीमाएं या आलोचना

  1. यह संशोधन तत्काल कर प्रणाली को सरल नहीं बना सका।

  2. विभिन्न राज्यों में बिक्री कर की दरें अलग अलग बनी रहीं जिससे पूर्ण समानता नहीं आई।

  3. एकीकृत अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की आवश्यकता बनी रही जो बाद में सन् 2017 में जीएसटी के रूप में लागू हुई।

  4. कुछ राज्यों को लगा कि इस संशोधन से उनकी वित्तीय स्वायत्तता में कमी आई है।


परीक्षा हेतु प्रमुख बिंदु

  1. संशोधन वर्ष 1956

  2. संशोधन प्रकार वित्तीय और कराधान

  3. संबंधित अनुच्छेद 269 और 286

  4. नई प्रविष्टि संघ सूची में प्रविष्टि 92ए

  5. संबंधित अनुसूची सातवीं अनुसूची

  6. उद्देश्य अंतरराज्यीय व्यापार और कराधान का विनियमन

  7. महत्व वित्तीय संघवाद और आर्थिक एकता को बढ़ावा देना

  8. संबद्ध आयोग कराधान जांच आयोग


संक्षेप में

संविधान का छठा संशोधन अधिनियम 1956 अंतरराज्यीय बिक्री और खरीद के कराधान को स्पष्ट और सुव्यवस्थित करने के लिए लाया गया था। इसने अनुच्छेद 269 और 286 में संशोधन किया, संघ सूची में प्रविष्टि 92ए जोड़ी और केंद्र व राज्यों के बीच वित्तीय सामंजस्य स्थापित किया। यह संशोधन भारत की कर प्रणाली को एकीकृत दिशा में आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण कदम था।