पृष्ठभूमि  
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 का मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय था जिसने संसद और संविधान के संबंध को गहराई से प्रभावित किया। यह मामला इस प्रश्न से जुड़ा था कि क्या संसद को संविधान के भाग 3 में दिए गए मौलिक अधिकारों में संशोधन करने का अधिकार है। यह उस समय आया जब भारत भूमि सुधार और संपत्ति अधिकारों में कटौती जैसे सामाजिक आर्थिक सुधारों से गुजर रहा था। यह निर्णय संसद की सुधार नीतियों की शक्ति और न्यायपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन का प्रतीक था।

इस मामले की पृष्ठभूमि प्रारंभिक संवैधानिक संशोधनों से जुड़ी थी जिनके माध्यम से भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया। पंजाब के गोलकनाथ परिवार ने इन संशोधनों को चुनौती दी और दावा किया कि इससे उनके संपत्ति के मौलिक अधिकारों अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 का उल्लंघन हुआ है।

यह मामला 11 न्यायाधीशों की पीठ ने सुना और 6:5 के बहुमत से निर्णय दिया गया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। यह भारत के संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था जिसने 1973 के केशवानंद भारती मामले में मूल संरचना सिद्धांत की नींव रखी।

Prelims परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य  
- निर्णय का वर्ष 1967  
- न्यायपीठ 11 न्यायाधीश 6:5 बहुमत  
- याचिकाकर्ता हेनरी और विलियम गोलकनाथ  
- प्रतिवादी पंजाब राज्य  
- संबंधित अनुच्छेद 13, 32, 368  
- प्रमुख प्रश्न क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है  
- परिणाम संसद ऐसा नहीं कर सकती  
- आगे का विकास 1973 में केशवानंद भारती मामले में निर्णय पलटा गया  

मुख्य प्रावधान और तथ्य  
1. पंजाब सरकार ने गोलकनाथ परिवार की भूमि भूमि सुधार कानून के तहत अधिग्रहित की।  
2. याचिकाकर्ताओं ने इसे अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।  
3. सर्वोच्च न्यायालय ने प्रथम, चतुर्थ और सत्रहवें संवैधानिक संशोधनों की वैधता पर विचार किया।  
4. इन संशोधनों द्वारा भूमि सुधार कानूनों को नौवीं अनुसूची में रखा गया था।  
5. मुख्य न्यायाधीश के सुब्बा राव की अध्यक्षता में बहुमत ने कहा कि मौलिक अधिकार अपरिवर्तनीय हैं।  
6. अनुच्छेद 368 केवल संशोधन की प्रक्रिया बताता है लेकिन शक्ति नहीं देता।  
7. यदि कोई संशोधन मौलिक अधिकारों को सीमित करता है तो वह अनुच्छेद 13(2) के तहत अवैध माना जाएगा।  
8. निर्णय में न्यायपालिका की भूमिका को संविधान की पवित्रता बनाए रखने में महत्वपूर्ण बताया गया।  
9. न्यायमूर्ति वान्छू ने असहमति जताते हुए कहा कि संसद की शक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं है।  
10. परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए मौलिक अधिकारों में संशोधन पर रोक लग गई।  

महत्व  
1. मौलिक अधिकारों की सर्वोच्चता स्थापित हुई।  
2. मूल संरचना सिद्धांत के विकास की दिशा में यह पहला कदम था।  
3. संसद की शक्ति सीमित कर संविधान की स्थायित्व को बल मिला।  
4. न्यायिक समीक्षा और संसदीय प्रभुत्व के बीच संतुलन स्पष्ट हुआ।  
5. सामाजिक सुधारों को संवैधानिक दायरे में लाने का महत्व सामने आया।  
6. यह निर्णय न्यायपालिका और संसद दोनों के संवैधानिक संतुलन का उदाहरण बना।  

आलोचना या सीमाएं  
1. इस निर्णय की आलोचना संसद की सुधार नीतियों को बाधित करने के कारण की गई।  
2. इससे न्यायपालिका और विधायिका के बीच मतभेद उत्पन्न हुआ।  
3. 1971 में लाया गया 24वां संशोधन इस विवाद को हल करने का प्रयास था जिससे संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन का अधिकार मिला।  
4. कुछ विद्वानों ने इसे न्यायिक अतिक्रमण बताया।  
5. 1973 के केशवानंद भारती निर्णय ने संतुलन स्थापित करते हुए कहा कि संसद को संशोधन का अधिकार है लेकिन वह संविधान की मूल संरचना को नहीं बदल सकती।  

परीक्षा हेतु प्रमुख बिंदु  
- वर्ष 1967  
- अनुच्छेद 13, 32, 368  
- संबंधित संशोधन प्रथम, चतुर्थ, सत्रहवां  
- न्यायपीठ 11 न्यायाधीश 6:5 बहुमत  
- मुख्य न्यायाधीश के सुब्बा राव  
- सिद्धांत मूल संरचना सिद्धांत का आधार  
- पलटा गया केशवानंद भारती मामला 1973  
- प्रभाव संशोधन शक्ति पर अस्थायी सीमा  
- महत्व न्यायिक समीक्षा की पुष्टि  
- उद्देश्य मौलिक अधिकारों की रक्षा  

संक्षेप में  
1967 का गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामला इस बात की पुष्टि करता है कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। इस निर्णय ने न्यायिक समीक्षा की प्रधानता को स्थापित किया और मूल संरचना सिद्धांत की नींव रखी जो आज भी भारतीय संविधान की व्याख्या का प्रमुख आधार है।