पृष्ठभूमि
एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) का मामला भारतीय संवैधानिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है। यह मामला अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र और उसकी सीमाओं से संबंधित था। अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि जब किसी राज्य में संवैधानिक मशीनरी विफल हो जाए तो वह राष्ट्रपति शासन लागू कर सके।
यह मामला तब उत्पन्न हुआ जब कर्नाटक में जनता दल की सरकार, जिसका नेतृत्व एस. आर. बोम्मई कर रहे थे, को 1989 में राज्यपाल की सिफारिश पर बर्खास्त कर दिया गया। राज्यपाल ने रिपोर्ट दी कि मुख्यमंत्री ने विधानसभा में बहुमत खो दिया है। बोम्मई ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया जिसने संघवाद के मूल स्वरूप की रक्षा की और अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को सीमित किया।

प्रीलिम्स परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  1. निर्णय का वर्ष: 1994

  2. पीठ की संरचना: 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ

  3. संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन)

  4. मुख्य मुद्दा: अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग और न्यायिक पुनरीक्षण की सीमा

  5. प्रमुख सिद्धांत: संघवाद संविधान की मूल संरचना का भाग है

  6. न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय

  7. निर्णय की तिथि: 11 मार्च 1994

  8. मुख्य न्यायाधीश: ए. एम. अहमदी (पीठ के सदस्य)

  9. संबंधित मामला: रमेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006)

  10. निर्णय का स्वरूप: ऐतिहासिक संवैधानिक व्याख्या

मुख्य प्रावधान और प्रमुख तथ्य

  1. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक पुनरीक्षण के अधीन है।

  2. अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की संतुष्टि पूर्णतः अंतिम नहीं है और न्यायालय इसकी समीक्षा कर सकता है।

  3. यदि किसी सरकार का बहुमत संदिग्ध हो तो परीक्षण विधानसभा के फर्श पर होना चाहिए, न कि राज्यपाल के निर्णय पर।

  4. अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में ही होना चाहिए।

  5. संघवाद को संविधान की मूल संरचना के रूप में मान्यता दी गई।

  6. यदि राष्ट्रपति शासन असंवैधानिक पाया जाता है तो बर्खास्त सरकार को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।

  7. इस निर्णय ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति-संतुलन स्थापित किया।

  8. अनुच्छेद 356 के राजनीतिक दुरुपयोग को सीमित किया गया।

  9. राष्ट्रपति शासन की प्रत्येक घोषणा संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति से गुजरनी चाहिए।

  10. यह निर्णय लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और न्यायिक नियंत्रण को मजबूत करता है।

महत्व

  1. बोम्मई मामला भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक मील का पत्थर है।

  2. इसने संघ और राज्यों के बीच शक्ति-संतुलन की रक्षा की।

  3. इसने राज्यपाल की निष्पक्ष भूमिका पर बल दिया।

  4. इसने न्यायपालिका को यह अधिकार दिया कि वह राष्ट्रपति शासन के निर्णय की समीक्षा कर सके।

  5. इसने केंद्र को राजनीतिक कारणों से राज्य सरकारों को बर्खास्त करने से रोका।

  6. लोकतंत्र और संघवाद के सिद्धांतों को मजबूत किया गया।

  7. इस निर्णय का प्रभाव बाद के कई निर्णयों पर पड़ा।

आलोचना या सीमाएं

  1. निर्णय के दिशा-निर्देश व्याख्यात्मक हैं, विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं।

  2. न्यायिक पुनरीक्षण बाद में होता है, इसलिए असंवैधानिक कार्य पहले घट सकते हैं।

  3. राज्यपाल की भूमिका अब भी राजनीतिक विवादों में प्रश्नों के घेरे में रहती है।

  4. कुछ मामलों में अब भी अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग देखा गया है।

परीक्षा के लिए प्रमुख बिंदु

  • वर्ष: 1994

  • अनुच्छेद: 356

  • पीठ की शक्ति: 9 न्यायाधीश

  • संबंधित सिद्धांत: संघवाद, मूल संरचना सिद्धांत, न्यायिक पुनरीक्षण

  • संबंधित मामला: रमेश्वर प्रसाद (2006)

  • महत्व: अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर नियंत्रण

  • परिणाम: संघीय लोकतंत्र और न्यायिक निगरानी को सुदृढ़ किया गया

संक्षेप में
1994 का एस. आर. बोम्मई मामला भारतीय संघीय लोकतंत्र की रक्षा का प्रतीक है। इसने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को सीमित किया और राष्ट्रपति शासन के निर्णयों को न्यायिक समीक्षा के अधीन लाकर संविधान की सर्वोच्चता को सुनिश्चित किया।