प्रस्तावना
भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक चेतना का प्रतीक है। हाल ही में तमिलनाडु में हिन्दी प्रतिबंध संबंधी विधेयक पर हुई चर्चा और उसके बाद हुए स्थगन ने भाषा-राजनीति के इस संवेदनशील पहलू को पुनः प्रमुखता दी है। राज्य सरकार का उद्देश्य तमिल भाषा की स्वायत्तता की रक्षा करना था, परंतु विधेयक का स्थगन यह दर्शाता है कि शासन ने संवैधानिक संतुलन और राष्ट्रीय एकता के मद्देनजर सावधानी बरती है। यह प्रसंग भारत में भाषाई संघवाद और सांस्कृतिक विविधता की जटिलता को समझने का अवसर प्रदान करता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय भाषा के प्रश्न पर तीखी बहसें हुईं। संविधान सभा ने अन्ततः हिन्दी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा घोषित किया तथा अंग्रेज़ी को एक निश्चित अवधि तक सहायक भाषा के रूप में रखा, जिसे बाद में 1963 के राजभाषा अधिनियम द्वारा अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया।
दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में भाषा हमेशा से राजनीतिक पहचान का केंद्र रही है। 1937–40 और 1965 के हिन्दी-विरोधी आंदोलनों ने द्रविड़ राजनीति को दिशा दी। इस आंदोलन ने हिन्दी के अनिवार्य प्रयोग का विरोध करते हुए तमिल भाषा और संस्कृति को राजनीतिक विमर्श का मूल बना दिया।
तमिलनाडु ने लगातार दो-भाषा नीति अपनाई है जिसमें केवल तमिल और अंग्रेज़ी को शिक्षा और प्रशासन में महत्व दिया गया है। प्रस्तावित विधेयक इसी नीति की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा था, जिसका उद्देश्य सरकारी संस्थानों और जनसंचार में हिन्दी के अनिवार्य प्रयोग को सीमित करना था।
वर्तमान परिदृश्य
वर्ष 2024 में तमिलनाडु विधानसभा में हिन्दी प्रयोग से संबंधित एक प्रारूप प्रस्ताव पर विचार हुआ। यह प्रस्ताव अभी विधेयक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था, किंतु इसकी सूचना मिलते ही राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो गई। इसके बाद राज्य सरकार ने कहा कि इस विषय पर व्यापक परामर्श और संवैधानिक परीक्षण आवश्यक है, इसलिए विधेयक को स्थगित किया जा रहा है।
यह निर्णय उस समय आया जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत बहुभाषावाद और मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस प्रकार तमिलनाडु का यह निर्णय एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय नीति के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
सरकारी नीतियाँ और कानूनी प्रावधान
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अनुच्छेद 343 – संघ की राजभाषा हिन्दी और सहायक भाषा अंग्रेज़ी।
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अनुच्छेद 345 – राज्य अपनी इच्छानुसार किसी भाषा को राजभाषा बना सकता है।
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अनुच्छेद 351 – हिन्दी के प्रचार के साथ अन्य भाषाओं की रक्षा का निर्देश।
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राजभाषा अधिनियम 1963 – अंग्रेज़ी के प्रयोग की निरंतरता।
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संविधान की आठवीं अनुसूची – 22 भाषाएँ सूचीबद्ध।
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 – बहुभाषावाद और मातृभाषा आधारित शिक्षा पर बल।
मुख्य चुनौतियाँ
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क्षेत्रीय संवेदनशीलता – भाषा पहचान और सम्मान से जुड़ा विषय है, किसी भी प्रकार का थोपाव राजनीतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है।
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संघीय संतुलन – केंद्र और राज्य के बीच भाषा नीति पर सामंजस्य बनाना कठिन कार्य है।
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नीति विरोधाभास – राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी प्रचार और राज्यों में स्थानीय भाषा संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती।
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शिक्षा नीति में व्यवहारिक कठिनाई – तीन भाषा सूत्र दक्षिणी राज्यों में प्रभावी नहीं हो पाया है।
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रोजगार असमानता – केन्द्र की परीक्षाओं में हिन्दी और अंग्रेज़ी के प्रभुत्व से गैर-हिन्दी भाषी अभ्यर्थियों को कठिनाई होती है।
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सांस्कृतिक स्वायत्तता बनाम राष्ट्रीय एकता – दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना शासन की सबसे बड़ी परीक्षा है।
आगे की राह
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भाषाई समानता के संवैधानिक सिद्धांत को व्यवहार में लागू करना।
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किसी भाषा के प्रचार में अनिवार्यता की जगह प्रोत्साहन की नीति अपनाना।
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अनुवाद, भाषांतरण और डिजिटल साधनों के माध्यम से राज्यों के बीच संचार को सरल बनाना।
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अंतर-राज्यीय युवा और शैक्षणिक विनिमय कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
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शिक्षा नीति को क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार लचीला बनाना।
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अंतर-राज्यीय भाषाई परिषद का गठन करना जो भविष्य के विवादों को संवाद से सुलझा सके।
परीक्षा के लिए महत्व
प्रारंभिक परीक्षा हेतु तथ्य
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अनुच्छेद 343 – संघ की राजभाषा हिन्दी देवनागरी लिपि में।
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अनुच्छेद 345 – राज्यों को अपनी भाषा अपनाने का अधिकार।
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राजभाषा अधिनियम – 1963।
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तमिलनाडु के हिन्दी-विरोधी आंदोलन – 1937–40 और 1965।
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आठवीं अनुसूची – 22 भाषाएँ।
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 2020।
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तमिलनाडु की दो-भाषा नीति – तमिल और अंग्रेज़ी।
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अनुच्छेद 351 – हिन्दी प्रचार हेतु दिशा-निर्देश।
मुख्य परीक्षा हेतु विश्लेषणात्मक बिंदु
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भाषा नीति भारत के सहकारी संघवाद का प्रतिबिंब है।
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तमिलनाडु का अनुभव भाषाई विविधता में एकता का उदाहरण है।
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क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय एकता में संतुलन बनाए रखना शासन की जिम्मेदारी है।
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शिक्षा नीति 2020 बहुभाषी समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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भाषाई सम्मान लोकतांत्रिक समरसता को मजबूत करता है।
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विधेयक का स्थगन लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचायक है।
साक्षात्कार हेतु बिंदु
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भाषा विविधता भारत की सांस्कृतिक शक्ति है।
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भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सहयोग आवश्यक है।
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सहकारी संघवाद भाषा संबंधी विवादों के समाधान का माध्यम बन सकता है।
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क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान राष्ट्रीय एकता को और मजबूत करता है।
संक्षेप में
तमिलनाडु में हिन्दी प्रतिबंध विधेयक का स्थगन भारत के संघीय ढाँचे की परिपक्वता और संवैधानिक विवेक का उदाहरण है। भाषाई पहचान की रक्षा और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाकर ही भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक भावना को सशक्त बना सकता है।
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