बंगाल के नवाबों ने 18वीं शताब्दी के भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। मुरशिद कुली खान से प्रारंभ होकर यह नवाबी शासन 1757 की प्लासी की लड़ाई तक स्वतंत्र रहा, जिसके बाद बंगाल ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आ गया। यह काल स्वतंत्र शासन से औपनिवेशिक नियंत्रण की ऐतिहासिक यात्रा का प्रतीक है।

शासन काल बंगाल के नवाब प्रमुख घटनाएँ / तथ्य
1717–1727 मुरशिद कुली खान मुगल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा बंगाल के पहले नवाब नियुक्त; राजधानी को ढाका से मुरशिदाबाद स्थानांतरित किया; राजस्व व्यवस्था में सुधार किए; बंगाल को व्यावहारिक स्वायत्तता प्रदान की।
1727–1739 शुजा-उद-दीन मुहम्मद खान मुरशिद कुली खान के दामाद; उनके शासन में बंगाल की समृद्धि बनी रही; व्यापार और संस्कृति का विस्तार हुआ।
1739–1740 सरफराज खान शुजा-उद-दीन के पुत्र; अल्पकालीन शासन; 1740 में गिरिया के युद्ध में अलीवर्दी खान से पराजित होकर मारे गए।
1740–1756 अलीवर्दी खान सरफराज खान को हराकर सत्ता प्राप्त की; मराठा आक्रमणों (बर्गी छापों) को विफल किया; बंगाल की स्वतंत्रता और प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखी।
1756–1757 सिराज-उद-दौला अलीवर्दी खान के पौत्र; अंग्रेजों और आंतरिक षड्यंत्रों का सामना किया; 1757 के प्लासी के युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव से पराजित हुए; स्वतंत्र नवाबी शासन का अंत हुआ।
1757–1760 मीर जाफर प्लासी के बाद अंग्रेजों द्वारा नवाब बनाया गया; कठपुतली शासक; अंग्रेजों ने बंगाल की आर्थिक व प्रशासनिक शक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त किया।
1760–1763 मीर कासिम मीर जाफर के दामाद; स्वतंत्रता पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया; राजधानी मुंगेर स्थानांतरित की; सुधार किए; 1764 के बक्सर युद्ध में पराजित हुए।
1763–1765 मीर जाफर (पुनः नियुक्त) मीर कासिम की हार के बाद पुनः नवाब बने; ईस्ट इंडिया कंपनी का पूर्ण नियंत्रण।
1765–1770 (नाममात्र) नज्म-उद-दौला मीर जाफर के पुत्र; 1765 में इलाहाबाद संधि के बाद ब्रिटिशों ने दीवानी अधिकार प्राप्त किए; नवाब केवल नाममात्र के शासक रह गए।
1770–1793 (नाममात्र) मुबारक-उद-दौला और उत्तराधिकारी नवाबी का अधिकार प्रतीकात्मक रह गया; वास्तविक सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चली गई।