पृष्ठभूमि
18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन के दौरान उत्तर भारत में कई क्षेत्रीय अफगान शक्तियाँ उभरकर सामने आईं। इनमें प्रमुख थीं रुहेल पठान (Rohilla Pathans) और बंगश पठान (Bangash Pathans)। इन दोनों अफगान समूहों ने मुगल शासन से ब्रिटिश सत्ता तक के संक्रमण काल में उत्तर भारत की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
रुहेलों ने रुहेलखंड (वर्तमान बरेली और रामपुर क्षेत्र) में अपनी सत्ता स्थापित की, जबकि बंगश पठानों ने फर्रुखाबाद में अपना प्रभाव क्षेत्र बनाया। दोनों ही अफगान मूल के योद्धा थे जिन्होंने अपनी सैन्य शक्ति और प्रशासनिक क्षमता के बल पर क्षेत्रीय शासन की नींव रखी।
प्रीलिम्स परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
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रुहेल पठान अफगान योद्धा थे जिन्होंने उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड क्षेत्र में राज्य स्थापित किया।
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इनके संस्थापक अली मोहम्मद खान थे जिन्होंने स्वतंत्र रुहेला राज्य की स्थापना की।
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बंगश पठान अफगान जनजाति के थे जिन्होंने फर्रुखाबाद क्षेत्र में शासन स्थापित किया।
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इनके संस्थापक मोहम्मद खान बंगश थे जो मुगल सम्राट फर्रुखसियर के अधीन सेनापति थे।
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रुहेला युद्ध (1774) अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और अंग्रेजों की सहायता से रुहेलों के विरुद्ध लड़ा गया।
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इस युद्ध के बाद रुहेलखंड ब्रिटिश प्रभाव में आ गया।
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दोनों ही समूह अपने मजबूत सैन्य संगठन और प्रशासनिक कौशल के लिए प्रसिद्ध थे।
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ये अफगान प्रभाव के उत्तर भारतीय विस्तार का प्रतीक बने।
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18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय से इनकी शक्ति समाप्त हो गई।
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इनका प्रभाव आज भी उत्तर प्रदेश के इतिहास और संस्कृति में देखा जा सकता है।
मुख्य प्रावधान और प्रमुख तथ्य
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रुहेल पठान (Rohilla Pathans)
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मूल अफगानिस्तान के रोह क्षेत्र से आए थे।
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मुगल काल के उत्तरार्ध में भारत आए और रुहेलखंड क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया।
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संस्थापक: अली मोहम्मद खान (1708–1748)
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राजधानी: बरेली
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मराठों और अवध के नवाब से संघर्ष किया।
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1774 के रुहेला युद्ध में स्वतंत्रता समाप्त हो गई।
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बाद में नवाब फैजुल्ला खान ने ब्रिटिश संरक्षण में रामपुर रियासत की स्थापना की।
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बंगश पठान (Bangash Pathans)
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अफगानिस्तान की बंगश जनजाति से संबंधित थे।
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उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद क्षेत्र में बसे।
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संस्थापक: मोहम्मद खान बंगश (1665–1743)
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मुगल सेनापति के रूप में बुंदेलखंड और अवध तक प्रभाव स्थापित किया।
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उनके पुत्र क़ायम खान और पौत्र अहमद खान ने भी शासन किया।
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मराठों से संघर्ष के कारण उनकी शक्ति धीरे-धीरे घटती गई।
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18वीं शताब्दी के अंत तक बंगशों का प्रभाव समाप्त हो गया।
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महत्व
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दोनों ने मुगल काल के पतन के बाद उत्तर भारत में स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्तियों का उदय दर्शाया।
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उन्होंने शासन में अफगान परंपराओं और सैन्य गौरव को बनाए रखा।
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इनका उदय मुगल साम्राज्य के विघटन और प्रांतीय स्वायत्तता के दौर को दर्शाता है।
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रुहेला युद्ध भारतीय राजनीति में ब्रिटिश हस्तक्षेप की शुरुआत का प्रतीक था।
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इनका प्रभाव उत्तर प्रदेश की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में लंबे समय तक रहा।
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इनके केंद्र बरेली और फर्रुखाबाद व्यापार और संस्कृति के केंद्र बने।
सीमाएँ या आलोचना
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अफगान सरदारों के बीच आपसी मतभेदों ने उनकी एकता कमजोर की।
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पड़ोसी शक्तियों जैसे अवध और मराठों से निरंतर संघर्ष ने उनकी स्थिति कमजोर की।
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ब्रिटिश कूटनीति और हस्तक्षेप के कारण उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गई।
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अन्य भारतीय शक्तियों से स्थायी गठबंधन न बना पाने के कारण वे अलग-थलग पड़े।
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केंद्रीय नेतृत्व के अभाव में उनकी शक्ति बिखरती गई।
परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु
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रुहेल शक्ति के संस्थापक: अली मोहम्मद खान (बरेली)
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बंगश शक्ति के संस्थापक: मोहम्मद खान बंगश (फर्रुखाबाद)
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प्रमुख युद्ध: रुहेला युद्ध, 1774
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संबंधित शक्तियाँ: अवध का नवाब, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
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पतन काल: 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में
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प्रमुख शब्द: रुहेल पठान, बंगश पठान, अफगान प्रभाव, मुगल पतन, क्षेत्रीय शक्तियाँ
संक्षेप में
रुहेल और बंगश पठान अफगान मूल की शक्तियाँ थीं जिन्होंने मुगल साम्राज्य के पतन के समय उत्तर भारत में स्वतंत्र रियासतें स्थापित कीं। रुहेलों ने रुहेलखंड में और बंगशों ने फर्रुखाबाद में शासन किया। दोनों ने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर प्रतिष्ठा प्राप्त की, किंतु अंततः ब्रिटिश विस्तार और राजनीतिक संघर्षों के कारण उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गई।
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