पृष्ठभूमि
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) का मामला भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। यह मामला उस समय उठा जब केरल के एदनीर मठ के प्रमुख केशवानंद भारती ने केरल भूमि सुधार अधिनियम 1969 को चुनौती दी। उनका कहना था कि यह अधिनियम उनके धार्मिक संपत्ति प्रबंधन के अधिकारों का उल्लंघन करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 31 के तहत संरक्षित हैं। यह विवाद धीरे-धीरे इस बड़े संवैधानिक प्रश्न में बदल गया कि क्या संसद को संविधान में असीमित संशोधन का अधिकार है।
उस समय संसद ने 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधन पारित किए थे, जिनका उद्देश्य संसद को संविधान के किसी भी भाग, यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों में भी संशोधन का पूर्ण अधिकार देना था। सर्वोच्च न्यायालय को यह तय करना था कि क्या संसद के संशोधन अधिकार की कोई सीमा है या नहीं।
प्रीलिम्स परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
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निर्णय का वर्ष: 1973
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पीठ की शक्ति: 13 न्यायाधीश (भारतीय न्यायिक इतिहास में सबसे बड़ी पीठ)
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मुख्य न्यायाधीश: एस. एम. सिकरी
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प्रमुख अनुच्छेद: अनुच्छेद 13, 31 और 368
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संबंधित संशोधन: 24वां, 25वां, 29वां
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परिणाम: "मूल संरचना सिद्धांत" की स्थापना
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बहुमत: 7 न्यायाधीश, अल्पमत: 6 न्यायाधीश
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याचिकाकर्ता: केशवानंद भारती (एदनीर मठ, केरल)
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प्रतिवादी: केरल राज्य
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सुनवाई की अवधि: 68 दिन
मुख्य प्रावधान और प्रमुख तथ्य
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याचिकाकर्ता ने 24वें, 25वें और 29वें संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी।
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इन संशोधनों का उद्देश्य संसद को संविधान में असीम संशोधन की शक्ति देना था।
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सर्वोच्च न्यायालय ने 7:6 के निर्णय में कहा कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन का अधिकार तो है, परंतु वह संविधान की मूल संरचना को नहीं बदल सकती।
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न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "संशोधन" का अर्थ संविधान को नष्ट करना या समाप्त करना नहीं है।
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इस निर्णय से "मूल संरचना सिद्धांत" की अवधारणा उत्पन्न हुई।
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न्यायालय ने मूल विशेषताओं की संपूर्ण सूची नहीं दी, लेकिन कुछ प्रमुख तत्व बताए जैसे संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा और धर्मनिरपेक्षता।
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यह सिद्धांत संसद के संशोधन अधिकार पर एक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है ताकि संविधान की पहचान सुरक्षित रहे।
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यह निर्णय संसद और न्यायपालिका के बीच संतुलन का प्रतीक बना।
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न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना ने निर्णायक बहुमत राय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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इस मामले ने सिद्ध किया कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतंत्र और स्वतंत्रता की जीवंत आत्मा है।
महत्व
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इस निर्णय ने संसद की शक्ति को सीमित किया कि वह संविधान की मूल विशेषताओं को नहीं बदल सकती।
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इसने मौलिक अधिकारों की रक्षा की और उन्हें समाप्त होने से बचाया।
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न्यायिक समीक्षा की शक्ति को मजबूत किया गया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पुनःस्थापित किया गया।
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संविधान में लचीलापन और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखा गया।
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इसने सुनिश्चित किया कि भारतीय संविधान सर्वोच्च कानून रहे और उसका लोकतांत्रिक स्वरूप सुरक्षित रहे।
आलोचना या सीमाएँ
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मूल संरचना सिद्धांत की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई, जिससे अस्पष्टता बनी रही।
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आलोचकों का मत है कि इससे न्यायपालिका को अत्यधिक व्याख्यात्मक शक्ति मिल गई।
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7:6 के निर्णय का बहुत छोटा अंतर न्यायालय के भीतर मतभेद दर्शाता है।
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बाद के मामलों जैसे इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975) और मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) में इस सिद्धांत को और स्पष्ट किया गया।
परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु
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वर्ष: 1973
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मामला: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
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पीठ: 13 न्यायाधीश
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निर्णय अनुपात: 7:6
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मुख्य न्यायाधीश: एस. एम. सिकरी
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याचिकाकर्ता: केशवानंद भारती
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स्थापित सिद्धांत: मूल संरचना सिद्धांत
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अनुच्छेद: 13, 31, 368
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संबंधित संशोधन: 24वां, 25वां, 29वां
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संबंधित मामले: गोलकनाथ (1967), इंदिरा गांधी (1975), मिनर्वा मिल्स (1980)
संक्षेप में
1973 का केशवानंद भारती निर्णय भारतीय संविधान में "मूल संरचना सिद्धांत" की स्थापना का आधार बना। इसने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित किया और यह सुनिश्चित किया कि लोकतंत्र, कानून का शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसी मूल विशेषताएँ सदा सुरक्षित रहें।
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