पृष्ठभूमि
भारत का
संविधान 1950 में लागू होने के बाद सरकार
ने पहला संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 लाया। इसका
उद्देश्य संपत्ति के अधिकार पर कुछ सीमाएँ लगाना और भूमि सुधार कानूनों को वैध
बनाना था। नागरिकों ने इस संशोधन को चुनौती दी कि संसद को मौलिक अधिकारों में
संशोधन करने का अधिकार नहीं है। यही विवाद शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार (1951) मामले के रूप में सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
मुख्य प्रावधान
और प्रमुख तथ्य
- याचिकाकर्ता
शंकरी प्रसाद का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों (भाग III) में संशोधन नहीं किया जा सकता।
- भारत
सरकार का मत था कि संविधान संशोधन की शक्ति में मौलिक अधिकारों में संशोधन का
अधिकार भी शामिल है।
- मुख्य
प्रश्न यह था कि क्या संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति है।
- सर्वोच्च
न्यायालय ने प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 की वैधता को बरकरार रखा।
- न्यायालय
ने कहा कि अनुच्छेद 13 में
“कानून” (law) शब्द में
संविधान संशोधन शामिल नहीं है, इसलिए
संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
महत्व
- यह संसद
की संशोधन शक्ति की व्याख्या करने वाला पहला प्रमुख निर्णय था।
- इसने
स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 368 के तहत
किए गए संविधान संशोधन अनुच्छेद 13
के अंतर्गत नहीं आते।
- इस निर्णय
ने प्रारंभिक वर्षों में संसद की सर्वोच्चता को सशक्त किया।
आलोचना या
सीमाएँ
- आलोचकों
का कहना था कि इसने संसद को अत्यधिक शक्ति प्रदान कर दी।
- बाद में
गोलकनाथ (1967) और
केशवानंद भारती (1973) मामलों
में इस निर्णय की पुनर्व्याख्या की गई और सीमाएँ निर्धारित की गईं।
परीक्षा हेतु
प्रमुख बिंदु
- वर्ष: 1951
- मामला:
शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार
- मुद्दा:
क्या संसद अनुच्छेद 368 के तहत
मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है
- निर्णय:
हाँ, संसद को यह शक्ति है
- संबंधित
अनुच्छेद: अनुच्छेद 13 और 368
- संबंधित
संशोधन: प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951
- पीठ:
मुख्य न्यायाधीश एच. जे. कानिया की अध्यक्षता वाली 5 न्यायाधीशों की पीठ
संक्षेप में
शंकरी प्रसाद
मामला (1951) संसद की संविधान संशोधन
शक्ति को मान्यता देने वाला ऐतिहासिक निर्णय था। इसने संसद और मौलिक अधिकारों के
बीच संतुलन की बहस की नींव रखी।
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