पृष्ठभूमि
- भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
- लागू होने के तुरंत बाद कुछ समस्याएँ सामने आईं –
- मौलिक अधिकारों का दुरुपयोग : खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19) का उपयोग सरकार-विरोधी भाषणों और गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।
- जमींदारी उन्मूलन कानूनों को चुनौती : कई राज्यों ने भूमि सुधार के लिए ज़मींदारी उन्मूलन क़ानून बनाए, जिन्हें अदालतों में Right to Property (अनुच्छेद 19(1)(f) और 31) के आधार पर चुनौती दी गई।
- सामाजिक न्याय की राह में बाधाएँ : अनुसूचित जातियों/पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बनाने में कठिनाई हो रही थी।
इन्हीं परिस्थितियों से निपटने के लिए नेहरू सरकार ने 1951 में संविधान का पहला संशोधन लाया।
प्रमुख प्रावधान (Main Provisions)
1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर "युक्तियुक्त प्रतिबंध"
- मूल संविधान में अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई विशेष सीमा नहीं थी।
- अदालतों (जैसे Romesh Thapar बनाम State of Madras, 1950 और Brij Bhushan बनाम State of Delhi, 1950) ने सरकार के प्रतिबंधों को असंवैधानिक करार दिया।
- संशोधन के बाद अनुच्छेद 19(2) में “युक्तियुक्त प्रतिबंध” (reasonable restrictions) जोड़े गए।
- प्रतिबंध के आधार:
- राज्य की सुरक्षा
- भारत की अखंडता
- सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order)
- शिष्टाचार और नैतिकता
- न्यायालय की अवमानना
- मानहानि (Defamation)
- अपराध के लिए उकसाना (Incitement to an offence)
2. भूमि सुधार और संपत्ति अधिकार
- अनुच्छेद 31B और नवम अनुसूची (9th Schedule) को जोड़ा गया।
- उद्देश्य:
- भूमि सुधार कानूनों और जमींदारी उन्मूलन अधिनियमों को न्यायिक समीक्षा से बचाना।
- इसमें शुरू में 13 कानून डाले गए।
- अनुच्छेद 31A भी जोड़ा गया, जिससे जमींदारी उन्मूलन कानूनों को संविधान विरोधी नहीं ठहराया जा सके।
3. समानता का अधिकार और विशेष प्रावधान
- अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया –
- इससे राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति मिली।
- यह आरक्षण नीति का संवैधानिक आधार बना।
4. कुछ अन्य बदलाव
- अनुच्छेद 19(1)(g) – व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर “व्यावसायिक हित में” प्रतिबंध की अनुमति।
- संसद और राज्य विधानमंडलों को अधिक स्पष्ट शक्ति प्रदान की गई।
महत्व (Significance)
- यह भारतीय संविधान का पहला और बहुत ही महत्वपूर्ण संशोधन था।
- इससे सरकार को सामाजिक-आर्थिक सुधार लागू करने में मदद मिली।
- मौलिक अधिकार बनाम समाज के हित के बीच संतुलन स्थापित किया गया।
- नवम अनुसूची का जन्म हुआ, जो आगे चलकर न्यायिक समीक्षा से बचाव का साधन बनी (हालांकि 2007 में I.R. Coelho Case में सुप्रीम कोर्ट ने नवम अनुसूची की सीमाएँ तय कीं)।
आलोचनाएँ (Criticism)
- इस संशोधन को “स्वतंत्रता पर आघात” कहा गया।
- कई विद्वानों ने कहा कि यह सरकार द्वारा मौलिक अधिकारों को कमजोर करने की शुरुआत थी।
- प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक की वजह से इसे “ड्राकोनियन” भी कहा गया।
परीक्षा दृष्टिकोण से प्रमुख तथ्य
- वर्ष – 1951
- मुख्य उद्देश्य –
- भूमि सुधार लागू करना
- आरक्षण का संवैधानिक आधार
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध
- नवम अनुसूची – जोड़ी गई
- अनुच्छेद 15(4), 31A, 31B – जोड़े गए
- केस संदर्भ – Romesh Thapar (1950), Brij Bhushan (1950)
संक्षेप में :
प्रथम संशोधन
अधिनियम, 1951 को भारतीय संविधान में सबसे
क्रांतिकारी संशोधन माना जाता है। इसने भूमि सुधार, आरक्षण और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के संवैधानिक आधार को स्थापित किया।
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