परिचय
सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक हथियारों का विकास वैश्विक सैन्य प्रौद्योगिकी में एक नए युग की शुरुआत है। भारत के लिए यह केवल रक्षा-शक्ति का विस्तार नहीं बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक निवारण की दिशा में एक निर्णायक कदम है। सुपरसोनिक हथियार ध्वनि की गति से तेज चलने वाले अत्याधुनिक हथियार हैं जो सटीकता और तीव्रता प्रदान करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में राज्य के लिए राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देने का दायित्व निर्धारित है। इसलिए उन्नत हथियार प्रणालियों का विकास भारत की आत्मनिर्भर और शांतिपूर्ण विकास दृष्टि के अनुरूप है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ
भारत की मिसाइल तकनीक यात्रा 1980 के दशक में एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) से शुरू हुई, जिसने पृथ्वी, अग्नि, नाग, त्रिशूल और आकाश जैसी मिसाइलों को जन्म दिया। बाद में भारत ने रूस के साथ मिलकर सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल विकसित की जो लगभग Mach 2.8 की गति से चलती है। इस मिसाइल प्रणाली ने भारत की सटीक हमले की क्षमता को बढ़ाया। इसके बाद DRDO ने स्वदेशी सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए स्क्रामजेट और रैमजेट आधारित अनुसंधान प्रारंभ किए।
अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश पहले से ही Mach 5 से अधिक गति वाले हाइपरसोनिक हथियारों पर काम कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत की तकनीकी प्रगति क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने और रणनीतिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

वर्तमान परिदृश्य
भारत आज उन कुछ देशों में शामिल है जिनके पास परिचालन सुपरसोनिक हथियार हैं और जो हाइपरसोनिक प्रणाली के परीक्षण में अग्रसर हैं। DRDO ने सुपरसोनिक मिसाइल के विस्तारित संस्करण का सफल परीक्षण किया है जिसकी सीमा 800 किलोमीटर तक है। 2024 में भारत ने ओडिशा के तट से हाइपरसोनिक मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया, जिसमें उच्च सटीकता और स्थिरता प्रदर्शित हुई। हैदराबाद स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (DRDL) ने स्क्रामजेट इंजन के सफल परीक्षण में 1,000 सेकंड से अधिक अवधि तक संचालन कर यह सिद्ध किया कि भारत उच्च गति प्रणोदन तकनीक में आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहा है।
भारत तीनों सेनाओं में इन प्रणालियों का एकीकरण कर रहा है। नौसेना, वायुसेना और थलसेना में सुपरसोनिक प्रणालियों के विभिन्न संस्करण तैनात हैं। रक्षा औद्योगिक गलियारे (Defence Industrial Corridors) के अंतर्गत उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में मिसाइल निर्माण संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं जिससे स्वदेशी उत्पादन क्षमता और रोजगार सृजन में वृद्धि हो रही है।

सरकारी नीतियाँ और कानूनी प्रावधान
भारत सरकार ने रक्षा-उद्योग के स्वदेशीकरण को प्रोत्साहन देने के लिए आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएँ लागू की हैं। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में ‘Buy Indian’ और ‘Make Indian’ श्रेणियों को प्राथमिकता दी गई है। हाल के वर्षों में सरकार ने दीर्घ-दूरी सटीक हमला प्रणालियों, सुपरसोनिक मिसाइलों और ड्रोन के आधुनिकीकरण हेतु कई परियोजनाओं को स्वीकृति दी है।
संविधान के अनुच्छेद 51 में राज्य के लिए यह दायित्व निहित है कि वह देश की अखंडता की रक्षा करे और अंतरराष्ट्रीय शांति का पालन करे। भारत 2016 में मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) का सदस्य बना जिससे मिसाइल सहयोग और रेंज वृद्धि के नए अवसर खुले। DRDO के हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोन्स्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) जैसे कार्यक्रम सरकारी वित्त और नीतिगत समर्थन से आगे बढ़ रहे हैं।

चुनौतियाँ और समस्याएँ

  1. तकनीकी सीमाएँ: हाइपरसोनिक प्रणोदन के लिए उच्च तापमान सामग्री, सटीक नियंत्रण और उन्नत सेंसर की आवश्यकता होती है। भारत अभी भी कुछ घटकों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर है।

  2. उच्च लागत: इन प्रणालियों का विकास और रखरखाव अत्यधिक महँगा है, जिससे उत्पादन-स्तर पर निरंतरता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है।

  3. रणनीतिक अस्थिरता: अत्यधिक तीव्र हथियारों की तैनाती से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है और हथियार दौड़ बढ़ सकती है।

  4. एकीकरण और नेटवर्किंग की कमी: भूमि, वायु और समुद्र प्लेटफार्मों के साथ समन्वित उपयोग हेतु उन्नत कमांड-कंट्रोल नेटवर्क की आवश्यकता है।

  5. निर्यात और नियामक प्रतिबंध: वैश्विक निर्यात नियंत्रण नियमों के कारण भारत इन प्रणालियों के वाणिज्यिक उपयोग में सीमित है।

  6. रक्षात्मक तैयारी: शत्रु देशों के हाइपरसोनिक हथियारों से निपटने के लिए भारत की रक्षा प्रणाली अभी विकास के चरण में है।

आगे की दिशा

  1. अनुसंधान और विकास में निवेश: DRDO और शैक्षणिक संस्थानों को उच्च तापमान सामग्री, प्रणोदन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित नियंत्रण प्रणाली पर अनुसंधान हेतु सहयोग बढ़ाना चाहिए।

  2. सार्वजनिक-निजी भागीदारी: निजी उद्योग और स्टार्टअप को रक्षा-प्रणालियों के निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए।

  3. एकीकृत कमांड संरचना: त्रि-सेना संचालन के लिए संयुक्त सिद्धांत तैयार किए जाने चाहिए ताकि संचालन क्षमता बढ़े।

  4. रक्षात्मक ढाल का निर्माण: भारत को ऐसे मिसाइल-रक्षा प्रणाली विकसित करनी चाहिए जो तेज-गति वाले हथियारों को निष्क्रिय कर सके।

  5. रणनीतिक संवाद: क्षेत्रीय शांति बनाए रखने हेतु पारदर्शिता और कूटनीतिक वार्ता बढ़ाना आवश्यक है।

  6. मानव संसाधन विकास: वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए विशेष प्रशिक्षण और शोध कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।

परीक्षा के लिए महत्व

Prelims हेतु तथ्यात्मक बिंदु:

  1. एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) 1983 में प्रारंभ हुआ।

  2. भारत ने लगभग Mach 2.8 गति वाली सुपरसोनिक मिसाइल विकसित की है।

  3. भारत 2016 में मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) का सदस्य बना।

  4. हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोन्स्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) कार्यक्रम स्क्रामजेट इंजन पर आधारित है।

  5. उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित हैं।

  6. अनुच्छेद 51 में राज्य को शांति और संप्रभुता की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है।

  7. 2025 में DRDL ने 1,000 सेकंड तक स्क्रामजेट परीक्षण सफलतापूर्वक किया।

  8. सुपरसोनिक मिसाइल का 800 किमी रेंज वाला संस्करण परीक्षणाधीन है।

Mains हेतु विश्लेषणात्मक बिंदु:

  1. सुपरसोनिक हथियार भारत की रणनीतिक निवारण क्षमता को सशक्त करते हैं।

  2. आत्मनिर्भर भारत के तहत यह तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

  3. आक्रामक और रक्षात्मक संतुलन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

  4. स्वदेशी निर्माण से औद्योगिक वृद्धि, रोजगार और अनुसंधान में सुधार होता है।

  5. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदार उपयोग और पारदर्शिता आवश्यक है।

  6. हाइपरसोनिक तकनीक भविष्य की वायु और समुद्री रक्षा रणनीति को प्रभावित करेगी।

Interview हेतु विचार बिंदु:

  1. सुपरसोनिक हथियार भारत की तकनीकी प्रगति और आत्मविश्वास का प्रतीक हैं।

  2. इनका विकास निवारण के लिए होना चाहिए, आक्रामकता के लिए नहीं।

  3. रक्षा-विकास को शांति और स्थिरता के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

  4. आत्मनिर्भरता के साथ जिम्मेदार नीति-निर्देशन सर्वोपरि है।

संक्षेप में
सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक हथियार भारत की रक्षा क्षमता के तकनीकी युग का प्रतीक हैं। चुनौती इन प्रणालियों का विवेकपूर्ण उपयोग और संतुलित रणनीति में निहित है। आत्मनिर्भर अनुसंधान, औद्योगिक वृद्धि और रणनीतिक संवाद के माध्यम से भारत रक्षा-प्रौद्योगिकी में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर हो सकता है।