पृष्ठभूमि
- भारत का
संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
- इसके
तुरंत बाद सरकार ने जमींदारी उन्मूलन और भूमि पुनर्वितरण के लिए भूमि सुधार
उपाय शुरू किए।
- लेकिन कुछ
राज्य भूमि सुधार कानूनों को अदालतों ने संपत्ति के अधिकार के उल्लंघन के
आधार पर रद्द कर दिया।
- ऐसे
कानूनों की रक्षा करने और कृषिगत सुधारों को मजबूत करने के लिए 1954 में तृतीय
संविधान संशोधन अधिनियम लाया गया।
प्रमुख
प्रावधान और मुख्य तथ्य
- सातवीं
अनुसूची में संशोधन कर कुछ विषयों को संघ और राज्य सूची के बीच स्थानांतरित
किया गया, विशेषकर व्यापार और वाणिज्य से संबंधित।
- राज्य
विधानसभाओं को सार्वजनिक हित में व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता पर उचित
प्रतिबंध लगाने का अधिकार दिया गया।
- संसद और
राज्य विधानसभाओं को आवश्यक वस्तुओं के व्यापार से संबंधित कानून बनाने की
शक्ति प्रदान की गई।
- भूमि
सुधार और कृषिगत कानूनों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया।
महत्व
- भूमि
सुधार कानूनों को कानूनी संरक्षण मिला जो सामाजिक न्याय और भूमि पुनर्वितरण
के लिए आवश्यक था।
- संघ और
राज्यों के बीच व्यापार और वाणिज्य पर शक्ति संतुलन स्पष्ट किया गया।
- स्वतंत्रता
के बाद आर्थिक पुनर्गठन की नीतियों को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
आलोचना या
सीमाएँ
- आलोचकों
का कहना था कि भूमि सुधार कानूनों की रक्षा के लिए बार-बार संशोधन करना मौलिक
अधिकारों की पवित्रता को कमजोर करता है।
- इसे
व्यक्तिगत अधिकारों की कीमत पर विधायी शक्ति को अधिक बढ़ावा देने के रूप में
देखा गया।
परीक्षा
दृष्टिकोण से प्रमुख तथ्य
- वर्ष: 1954
- संशोधन:
तृतीय संविधान संशोधन अधिनियम
- केंद्र:
भूमि सुधार, व्यापार और वाणिज्य, सातवीं अनुसूची
- प्रभावित
अनुच्छेद: अनुच्छेद 31, 305
- उद्देश्य:
कृषिगत सुधार कानूनों की रक्षा और आवश्यक वस्तुओं के व्यापार का नियमन
संक्षेप में
तृतीय संविधान
संशोधन अधिनियम, 1954 ने भूमि सुधारों को मजबूत किया और संसद तथा राज्यों की
शक्तियों को व्यापार और वाणिज्य पर स्पष्ट किया, जिससे कृषिगत न्याय और
आवश्यक वस्तुओं का नियमन सुनिश्चित हुआ।
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