परिचय
वर्ष के आरंभ में बजट-तैयारी भारत के वित्तीय कैलेंडर का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो आर्थिक नीति, विकास प्राथमिकताओं और सार्वजनिक कल्याण उद्देश्य निर्धारित करता है। प्रारंभिक संकेत—पूर्व बजट चर्चाओं और वित्तीय अनुमानों के माध्यम से—मंत्रालयों, राज्यों, उद्योग और नागरिकों की अपेक्षाओं को दिशा देते हैं। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 112 और 266 के अनुरूप पारदर्शिता, लोकतांत्रिक योजना और संसाधन आवंटन की सुविधा प्रदान करती है।
पृष्ठभूमि व संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से भारत में बजट फरवरी के अंत में प्रस्तुत होता था, जो लंदन टाइमज़ोन के अनुरूप एक औपनिवेशिक विरासत थी। 1997 में समय 5 बजे शाम से बदलकर 11 बजे सुबह हुआ और 2017 से बजट तिथि 1 फरवरी कर दी गई। यह सुधार वैश्विक बेस्ट प्रैक्टिस के अनुसार है, जिससे संसद में तेज़ समीक्षा और वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल) की तत्काल शुरुआत संभव हो गई। आर्थिक सर्वेक्षण, पूर्व बजट चर्चा और वित्तीय अनुमान, पहले सप्ताह में बजट संबंधी तैयारियों को शुरू करते हैं, जिससे हितधारकों को योजनाएँ पुनर्स्थापित करने, बदलावों की आकांक्षा और सरकारी प्राथमिकताओं के साथ संचालन करना आसान हो जाता है।
वर्तमान परिदृश्य
नवीनतम चक्रों में, वित्त मंत्रालय अक्टूबर से ही बजट के लिए विचार-विमर्श शुरू करता है, जनवरी 31 को आर्थिक सर्वेक्षण और 1 फरवरी को बजट प्रस्तुत करता है। वर्ष 2025 में भी, 6 जनवरी तक पूर्व बजट चर्चाएं और हितधारकों की प्रस्तुतियाँ पूरी हो गईं। इससे मंत्रालयों, राज्यों और सार्वजनिक संस्थाओं को अपने अंदरूनी लक्ष्य, संसाधन और योजनाएँ बजट से पहले ही निर्धारित करने का समय मिलता है। आंकड़ों के अनुसार, अब 60% राज्यीय बजट अनुमान जनवरी मध्य तक संघीय प्रक्षेपणों का उल्लेख करते हैं, जिससे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय वित्तों में बेहतर समन्वय हुआ है। प्रमुख समाचार पत्रों के अनुसार, आर्थिक वृद्धि के पूर्व संकेत, कर प्रवृत्तियाँ और प्राथमिकता क्षेत्रों (स्वास्थ्य, अधोसंरचना, हरित ऊर्जा) की शुरुआती घोषणाओं ने बाज़ार और नीति विमर्श में स्थिरता प्रदान की है।
सरकारी नीतियाँ व कानूनी प्रावधान
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अनुच्छेद 112 (वार्षिक वित्तीय विवरण/बजट)
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अनुच्छेद 266 (भारत की समेकित निधि)
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वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) एक्ट, 2003
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संघ और राज्य बजट मैन्युअल्स
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केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) के अग्रिम अनुमान
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आर्थिक सर्वेक्षण
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वित्त मंत्रालय की पूर्व बजट बैठकें व अधिसूचनाएँ
चुनौतियाँ / मुद्दे
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डेटा की गुणवत्ता: प्रारंभिक संकेत विश्वसनीय और समयबद्ध आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर है, जो कभी-कभी बाधित हो सकते हैं।
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समन्वय संबंधी समस्याएँ: केन्द्र और राज्य वित्तीय कैलेंडर हमेशा समन्वित नहीं रहते, जिससे लाभान्वित योजनाओं में देरी हो सकती है।
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नीति अस्थिरता: वैश्विक घटनाएँ या वित्तीय झटके मूलभूत संकेतित लक्ष्यों को बाधित कर सकते हैं।
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समावेशन का अभाव: पूर्व बजट प्रक्रिया में बड़े हितधारकों को प्राथमिकता मिलती है, जबकि एमएसएमई, सिविल सोसाइटी और छोटे राज्यों को सीमित भागीदारी होती है।
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प्रशासनिक क्षमता: प्रशिक्षित कर्मियों व डिजिटल अवसंरचना की कमी से कई विभागों में तत्परता कम होती है।
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संचार संबंधी जोखिम: समय से पूर्व घोषणाएँ यदि स्पष्ट नहीं हों तो बाज़ार में अफवाह या अनचाहा प्रभाव पड़ सकता है।
आगे की राह
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डेटा प्रणाली को मजबूत करें: रीयल-टाइम, डिजिटल प्लेटफार्मों में निवेश कर वित्तीय, जनसंख्या एवं आर्थिक आंकड़ों को सटीक बनाएँ।
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पूर्व विचार-विमर्श को संस्थागत करें: अंतर-मंत्रालयी, उप-राष्ट्रीय चर्चाओं को औपचारिक बनाएं, जिससे भागीदारी और समावेशन बढ़े।
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वित्तीय कैलेंडर का समन्वय: केन्द्र-राज्य की समय-सारणी को मिलाकर खर्च और योजनाओं का प्रभाव बढ़ाएँ।
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क्षमता वृद्धि: अधिकारियों के प्रशिक्षण और डेटा प्रबंधन में निवेश करें।
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नियंत्रित पारदर्शिता: घोषणाओं के लिए चरणबद्ध संचार रणनीति अपनाएं।
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अनुकूलनशीलता: आकस्मिक आर्थिक बदलावों के लिए विवाद-निवारक तंत्र विकसित करें।
परीक्षा की दृष्टि से महत्व
प्रिलिम्स:
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1997: बजट प्रस्तुति का समय बदला गया।
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2017: प्रस्तुति की तिथि 1 फरवरी कर दी गई।
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अनुच्छेद 112 (वार्षिक वित्तीय विवरण/बजट)
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अनुच्छेद 266 (भारत की समेकित निधि)
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FRBM एक्ट, 2003
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आर्थिक सर्वेक्षण की तारीख: 31 जनवरी
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सीएसओ अग्रिम और संशोधित अनुमान
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वित्त मंत्रालय की पूर्व बजट परामर्श प्रक्रिया
मेनस:
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पूर्व बजट संकेत का वित्तीय अनुशासन व योजना पर प्रभाव।
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राज्य सरकारों में बजट समन्वय के प्रमुख उदाहरण।
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पारदर्शिता बनाम बाज़ार अस्थिरता को लेकर बहस।
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आर्थिक सर्वेक्षण की भूमिका।
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प्रारंभिक बजट प्रक्षेपण में FRBM नीति का महत्व।
इंटरव्यू:
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बजट के पूर्व संकेत से रणनीति एवं प्रशासनिक दक्षता बढ़ती है।
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संघ और राज्य बजट के समन्वय से संसाधन व जनकल्याण बेहतर होता है।
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मजबूत डेटा और नियंत्रित संचार से स्थिरता आती है।
संक्षेप में
प्रारंभिक बजट-तैयारी एवं संकेत वर्ष के शुरू में पारदर्शी, भविष्य-संगत और प्रभावी वित्तीय प्रशासन की नींव रखते हैं। इसके लिए सशक्त डेटा, समावेशी विमर्श, साझे कैलेंडर और अनुकूल रणनीतियाँ आवश्यक हैं।
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