परिचय

भारत में डिजिटल भुगतान नवाचार प्रौद्योगिकी, नीति और सामाजिक समावेशन के संगम पर खड़ा है। यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के व्यापक उपयोग से लेकर रिजर्व बैंक द्वारा सीबीडीसी (सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी) की पहल तक, वित्तीय समावेशन और पारदर्शिता पर भारत का फोकस संविधान के अनुच्छेद 39 (आजीविका के साधनों का अधिकार), 19 (व्यापार/वाणिज्य की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) से प्रेरित है। भुगतान प्लेटफार्म विशेष रूप से पिछड़े वर्गों, छोटे कारोबारियों और ग्रामीण आबादी के लिए समान विकास के मजबूत उपकरण बनते जा रहे हैं।


पृष्ठभूमि व संदर्भ

2016 में एनपीसीआई द्वारा यूपीआई शुरू होने के बाद भारत का भुगतान परिदृश्य तेजी से डिजिटल हुआ। इससे पहले, बैंकिंग, नकद और कार्ड आधारित व्यवस्था थी, जिसमें धीमी गति और सीमित पहुंच थी। एनईएफटी, आरटीजीएस, आईएमपीएस जैसी सुधारात्मक पहलें भले आई, पर यूपीआई ने वास्तविक समय, कम लागत, और सार्वभौमिक पहुंच उपलब्ध करायी। पिछले दशक में जनधन, आधार और मोबाइल (JAM) ट्रिनिटी, प्रधानमंत्री जनधन योजना और विमुद्रीकरण ने वित्तीय पहुंच को सशक्त किया। 2022-23 में सीबीडीसी के पायलट और लॉन्च के साथ भारत डिजिटल मुद्रा के क्षेत्र में अग्रणी बना, जिससे भुगतान व्यवस्था में क्रांति आई।


वर्तमान परिदृश्य

विश्व स्तर पर भारत भुगतान नवाचार में अग्रणी है, जहां 2025 में लगभग 250 अरब यूपीआई ट्रांजैक्शन (US$3.4 ट्रिलियन) हुई। यूपीआई अब 85% खुदरा भुगतान सेवाओं में योगदान देता है और 673 से अधिक बैंकों से जुड़ा है। त्योहार, सरकारी भुगतान, और वेतन प्रवाह यूपीआई में रिकॉर्ड मासिक लेन-देन उत्पन्न करते हैं—अक्टूबर 2025 में प्रतिमाह Rs 25 लाख करोड़ से अधिक। यूपीआई की सफलता दर (~99%) और आसान उपयोग से यह ई-वॉलेट व क्रेडिट कार्ड्स को पीछे छोड़ता जा रहा है। सीबीडीसी का आरंभिक पायलट बैंक और व्यापारियों के बीच सीमित लेकिन बढ़ते उपयोग के साथ शुरू हुआ है। नीति निर्माताओं द्वारा सीबीडीसी के लिए यूपीआई के साथ इंटरऑपरेबिलिटी और क्रॉस-बॉर्डर भुगतान, सब्सिडी ट्रांसफर व राजकोषीय प्रबंधन जैसी संभावनाएँ चर्चा में हैं।


सरकारी नीतियाँ व कानूनी प्रावधान

  • भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007

  • आरबीआई की सीबीडीसी नीति रूपरेखा (2022 से आगे)

  • यूपीआई के लिए एनपीसीआई दिशा-निर्देश

  • भारत का वित्तीय समावेशन योजना (2015 से)

  • प्रधानमंत्री डिजिटल भुगतान प्रोत्साहन योजना

  • आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम (APBS)

  • जनधन योजना और JAM ट्रिनिटी की एकीकरण

  • व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा विधेयक (2023 का मसौदा)

  • सरकारी लाभ और कल्याण को डिजिटल प्लेटफार्मों से जोड़ने के लिए अंतर-मंत्रालयी समन्वय

चुनौतियां / मुद्दे

  1. डिजिटल विभाजन: स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की अनियमित पहुंच से ग्रामीण/सीमांत क्षेत्रों में भुगतान नवाचार सीमित है।

  2. गोपनीयता और सुरक्षा: डिजिटल ट्रांजैक्शन बढ़ने से धोखाधड़ी, साइबर-हमले और डेटा सुरक्षा की चिंता बढ़ती है।

  3. नियामक जोखिम: यूपीआई, वॉलेट और सीबीडीसी में तालमेल की कमी से ग्राहक और सेवा प्रदाता भ्रमित हो सकते हैं।

  4. लागत व विस्तार: छोटे कारोबारियों और निम्न आय उपभोक्ताओं के लिए शुल्क, उपकरण लागत, या ऑनबोर्डिंग चुनौतीपूर्ण है।

  5. इंटरऑपरेबिलिटी: सीबीडीसी को मौजूदा भुगतान पाइपलाइन (UPI, IMPS, NEFT) में जोड़ना तकनीकी और कानूनी दृष्टि से जटिल है।

  6. व्यवहार संबंधी अवरोध: नकद लेन-देन अभी भी छोटे भुगतान और वरिष्ठ नागरिकों के बीच विश्वास का माध्यम बना हुआ है।

आगे की राह

  1. डिजिटल साक्षरता और ग्रामीण कनेक्टिविटी का विस्तार करें: तीव्र इन्फ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षण पर फोकस।

  2. गोपनीयता प्रोटोकॉल मजबूत करें: अनिवार्य एनक्रिप्शन, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और कठोर डेटा सुरक्षा नियम।

  3. प्लेटफार्म सिनेर्जी बढ़ाएँ: UPI, CBDC व अन्य चैनल के लिए तकनीकी समन्वय।

  4. समावेशन के लिए लागत कम करें: शून्य/मिनिमल फीस, सरकारी सब्सिडी, और निम्न आय उपभोक्ताओं को शुल्क छूट।

  5. निगरानी और विनियम: जोखिम के अनुसार नीति रूपांतरण।

  6. विश्वास का प्रचार: ग्रामीण व वरिष्ठ नागरिकों के लिए जागरूकता अभियान और सरल प्रक्रियाएँ।

परीक्षा के लिए महत्व

प्रारंभिक परीक्षा:

  • 2016: यूपीआई की शुरुआत (एनपीसीआई)

  • 2023: सीबीडीसी पायलट (आरबीआई)

  • भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007

  • प्रधानमंत्री डिजिटल भुगतान प्रोत्साहन योजना

  • JAM ट्रिनिटी क्रियान्वयन

  • एनपीसीआई (UPI के लिए नोडल संस्था)

  • APBS (आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम)

  • व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा विधेयक (2023 का मसौदा)

मुख्य परीक्षा:

  • केस स्टडी: यूपीआई और डीबीटी की बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँच

  • बहस: यूपीआई और सीबीडीसी में पारदर्शिता और समावेशन

  • उदाहरण: आरबीआई के सीबीडीसी पायलट प्रोजेक्ट

  • नीति: डेटा सुरक्षा, प्लेटफार्म समन्वय और विनियामक सुधार

  • विश्लेषण: वित्तीय पहुंच में शहरी-ग्रामीण अंतर को दूर करना

साक्षात्कार:

  • भुगतान नवाचार (यूपीआई, सीबीडीसी) वित्तीय समावेशन और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है।

  • भारत की सफलता सार्वजनिक-निजी साझेदारी और इन्फ्रास्ट्रक्चर विस्तार का परिणाम है।

  • चुनौतियाँ सुरक्षा, समावेशन और विश्वास से जुड़ी हैं—नीतिगत अनुकूलता जरूरी है।

संक्षेप में

यूपीआई से सीबीडीसी तक की यात्रा दिखाती है कि किस प्रकार भुगतान नवाचार वित्तीय समावेशन, आर्थिक विकास और नागरिक सशक्तिकरण को गहरा कर सकता है। आगे की सफलता के लिए, सुरक्षा, विश्वास और पहुँच को अनिवार्य किया जाना जरूरी है।