परिचय
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति कोविड-19 महामारी के अप्रत्याशित संकट के कारण रणनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। संविधान के अनुसार, सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्यों और केंद्र का साझा विषय (सूची II, प्रविष्टि 6) है, जिसमें समान पहुँच, कल्याण और आपदा प्रबंधन (अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार) जैसी दिशा-निर्देश शामिल हैं। महामारी ने व्यवस्था की खामियों को उजागर किया और ऐसे स्वास्थ्य तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित किया जो दैनिक जरूरतों एवं आपातकालीन दबाव दोनों को समावेशी और कुशलता से संभाल सके।
पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढाँचा औपनिवेशिक कानूनों (जैसे महामारी रोग अधिनियम 1897) से शुरू हुआ। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान, और टीबी, पोलियो, एचआईवी जैसे लक्षित कार्यक्रमों ने स्वास्थ्य पहुँच का विस्तार किया, लेकिन आपदा-पूर्व तैयारी अक्सर सीमित रही। कोविड-19 के शुरुआती जवाब में आपातकालीन कानूनों और तदर्थ व्यवस्था का सहारा लिया गया, जिससे आधुनिक और मजबूत नीति तंत्र व विश्वसनीय स्वास्थ्य अवसंरचना की अपरिहार्यता स्पष्ट हुई।
वर्तमान परिदृश्य
2025 में कोविड-19 का तीव्र चरण समाप्त हो चुका है, लेकिन कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के तहत स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाया है। लैब नेटवर्क, डिजिटल निगरानी (आरोग्य सेतु, कोविन), आपातकालीन अवसंरचना (ऑक्सीजन, आईसीयू) और स्वास्थ्य कर्मी सुरक्षा में निवेश किया गया है। इसके बावजूद, डेटा तंत्र में खंडितता, पहुँच में असमानता व संचालन में बाधाएँ, खासकर ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समूहों में, बाकी हैं। रिपोर्टों के अनुसार महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति व वरिष्ठ नागरिकों में कोविड मृत्यु दर अधिक रही। वन हेल्थ मिशन, जिसमें मानव, पशु व पर्यावरण स्वास्थ्य का एकीकरण है, अब भविष्य की महामारी से निपटने के लिए केंद्रीय नीति तत्व बन चुका है।
सरकारी नीतियाँ एवं कानूनी प्रावधान
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राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017: निवारक/उपचारात्मक देखभाल, बढ़े हूए बजट, व स्वास्थ्य समता।
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आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 एवं महामारी रोग अधिनियम, 1897 (2020 में स्वास्थ्य कर्मी सुरक्षा हेतु संशोधित)।
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राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) एवं हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन।
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एकीकृत रोग सतर्कता कार्यक्रम (IDSP) एवं भारतीय SARS-CoV-2 जेनेटिक्स कंसोर्टियम (INSACOG)।
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राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन।
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आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना: वित्तीय सुरक्षा।
चुनौतियाँ / मुद्दे
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पुराने कानून व लचीलापन की कमी: औपनिवेशिक कानून त्वरित स्थानीय कार्रवाई व क्लीनिकल दिशा-निर्देश में बाधक।
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डेटा खंडन: अक्षम, असंयोजित डेटा संग्रह व साझेदारी से समय पर निर्णय बाधित।
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अवसंरचना की कमी: ग्रामीण अस्पताल, लैब व हाई-डिमांड सुविधा पर्याप्त नहीं; आपूर्ति-शृंखला संवेदनशील।
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पहुँच व समता: महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति, प्रवासी श्रमिकों व वरिष्ठ नागरिकों को समयोचित व प्रभावी उपचार में बाधाएँ।
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फ्रंटलाइन कर्मी की सुरक्षा: PPE की कमी, प्रशिक्षण अंतर, व समाज की अस्वीकार्यता।
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गैर-कोविड देखभाल में बाधा: महामारी से टीबी, कैंसर, नियमित टीकाकरण जैसी सेवाओं में रुकावट।
आगे की राह
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कानूनी तंत्र को आधुनिक बनाना: त्वरित प्रतिक्रिया, स्पष्ट अधिकार व जवाबदेही हेतु विशेष सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन कानून।
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एकीकृत डिजिटल डेटा प्लेटफार्म: पारदर्शी व सुरक्षित डेटा साझेदारी, निजी क्षेत्र व नागरिक समाज की भागीदारी।
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स्थायी अवसंरचना व आपूर्ति शृंखला: लैब नेटवर्क, ऑक्सीजन सुविधा, टेलीमेडिसिन व जिला स्तर पर तैयारी।
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हाशिए पर समूहों तक पहुँच: लक्षित वित्तीय, शैक्षिक व स्वास्थ्य हस्तक्षेप।
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स्वास्थ्य कर्मियों को सुरक्षा व सशक्तिकरण: सार्वभौमिक PPE, सतत प्रशिक्षण, कानूनी संरक्षण, व सामुदायिक साझा सहभागिता।
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गैर-महामारी देखभाल की सततता: संकट के दौरान भी टीबी, कैंसर, अन्य सेवाओं का संचालन।
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पोस्ट-क्राइसिस समीक्षा: नियमित ऑडिट, माइक्रोप्लानिंग व सतत सुधार मैकेनिज्म।
परीक्षा के लिए महत्व
प्रारंभिक परीक्षा के लिए:
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1897: महामारी रोग अधिनियम; 2020 संशोधन (स्वास्थ्य कर्मी सुरक्षा)
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2005: आपदा प्रबंधन अधिनियम
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2017: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2.5% जीडीपी लक्ष्य)
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आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना
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राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन, एकीकृत रोग सतर्कता कार्यक्रम (IDSP)
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आरोग्य सेतु, कोविन ऐप
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INSACOG: जेनेटिक कंसोर्टियम
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राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन
मुख्य परीक्षा के लिए:
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महामारी प्रतिक्रिया में पुराने कानूनों का प्रभाव।
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केस स्टडी: कोविन प्लेटफार्म व डिजिटल निगरानी।
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ग्रामीण-शहरी कोविड-19 परिणामों में असमानता।
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टेलीमेडिसिन व डिजिटल अवसंरचना की भूमिका।
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उदाहरण: आयुष्मान भारत का गरीबों और हाशिए पर सेहत सुरक्षा।
साक्षात्कार के लिए:
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कोविड-19 ने मजबूत, समावेशी व डेटा-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य की आवश्यकता को उजागर किया।
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भविष्य की तैयारी हेतु एकीकृत डिजिटल प्लेटफार्म व कानूनी सुधार अनिवार्य हैं।
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समता, साझीदारी व तंत्रिक सशक्तता नीतिगत क्रियान्वयन का आधार हो।
संक्षेप में
भारत की स्वास्थ्य नीति प्रतिक्रियात्मक से प्रोएक्टिव व लचीली व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए, जिसमें समता, पारदर्शिता व लगातार निवेश केंद्र में हो। कोविड-19 की सीखें सुरक्षित भविष्य के लिए त्वरित सुधार की माँग करती हैं।
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