परिचय
भारत में वायु प्रदूषण आज सबसे गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संबंधी संकटों में से एक बन चुका है। स्वच्छ वायु गरिमामय जीवन के लिए आवश्यक है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) को जोड़ा गया, जिसने पर्यावरण संरक्षण को राज्य और नागरिकों का कर्तव्य बनाया। इन संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भारत विश्व के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल है। यह समस्या केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी हुई है। इसलिए खराब वायु गुणवत्ता से निपटना केवल प्रदूषण नियंत्रण का नहीं बल्कि संवैधानिक दायित्व और मानव अधिकार का प्रश्न है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
भारत में वायु प्रदूषण की समस्या पर नीति स्तर पर गंभीर ध्यान 1980 के दशक में गया जब औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की गति तेज हुई। वर्ष 1981 में वायु प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण अधिनियम पारित किया गया। वर्ष 1986 में भोपाल गैस त्रासदी के बाद पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ जिसने पर्यावरणीय विनियमन को कानूनी रूप दिया।
वर्ष 2000 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वाहनों के उत्सर्जन नियंत्रण और स्वच्छ ईंधन पर दिए गए निर्देशों ने इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। वर्ष 2015 में राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक और वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरुआत ने इसे संगठित नीति दृष्टि प्रदान की। धीरे धीरे भारत की वायु गुणवत्ता नीति प्रतिक्रिया आधारित से योजना आधारित दिशा में परिवर्तित हुई जिसमें स्वास्थ्य और सतत विकास को केंद्र में रखा गया।
वर्तमान परिदृश्य
हाल के आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से ऊँचा बना हुआ है। वर्ष 2024 में भारत का औसत पीएम 2.5 स्तर लगभग 50 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के सुरक्षित मानक से लगभग दस गुना अधिक है। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ जैसे शहर अक्सर बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में आते हैं।
विश्व बैंक का अनुमान है कि वायु प्रदूषण के कारण भारत की सकल घरेलू उत्पाद का लगभग आठ प्रतिशत हिस्सा प्रतिवर्ष आर्थिक हानि के रूप में जाता है। हर वर्ष दो मिलियन से अधिक समयपूर्व मृत्यु इस समस्या से जुड़ी हैं। इंदो गैंगेटिक मैदान जो देश की लगभग चालीस प्रतिशत आबादी का घर है सबसे प्रदूषित क्षेत्र है। यहां औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन धुआं, फसल अवशेष जलाना और बायोमास ईंधन प्रमुख कारण हैं। यद्यपि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान जैसी योजनाएं लागू हैं लेकिन सुधार की गति धीमी है। इसका प्रमुख कारण अनुपालन की कमी और संस्थागत समन्वय का अभाव है।
सरकारी नीतियाँ और कानूनी प्रावधान
भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कई कानूनी और नीतिगत प्रावधान बनाए गए हैं।
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संवैधानिक प्रावधान – अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g)।
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वायु अधिनियम 1981 – केंद्र और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना।
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पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 – केंद्र सरकार को व्यापक नियामक अधिकार प्रदान।
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राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम 2019 – पीएम 10 और पीएम 2.5 में बीस से तीस प्रतिशत कमी का लक्ष्य अब वर्ष 2026 तक चालीस प्रतिशत तक।
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वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग 2020 – एनसीआर राज्यों के बीच समन्वय हेतु।
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भारत स्टेज 6 मानक 2020 – वाहनों के उत्सर्जन नियंत्रण हेतु।
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प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना – स्वच्छ ईंधन के माध्यम से घरेलू प्रदूषण में कमी।
मुख्य चुनौतियाँ
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अनुपालन की कमजोरी – सख्त कानूनों के बावजूद प्रवर्तन कमजोर और असमान है।
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संस्थागत बिखराव – अनेक एजेंसियों के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं है।
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डेटा की कमी – पर्याप्त निगरानी स्टेशन न होने से नीति निर्माण कठिन होता है।
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ग्रामीण उपेक्षा – ग्रामीण क्षेत्रों में बायोमास और खुले में जलाने की प्रवृत्ति अनियंत्रित है।
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आर्थिक हितों का टकराव – उद्योग और परिवहन क्षेत्र लागत के कारण स्वच्छ तकनीक अपनाने से हिचकते हैं।
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जनजागरूकता की कमी – नागरिक सहभागिता सीमित है और व्यवहार परिवर्तन धीमा है।
आगे की राह
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क्षेत्रीय दृष्टिकोण – केवल शहर आधारित नहीं बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर योजना बने।
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संस्थागत सुदृढ़ीकरण – प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पर्याप्त वित्त, तकनीकी क्षमता और प्रशिक्षित जनशक्ति दी जाए।
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तकनीकी बदलाव – इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और धूल नियंत्रण उपायों को बढ़ावा दिया जाए।
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स्वास्थ्य नीति समन्वय – प्रदूषण नीति में स्वास्थ्य प्रभाव आकलन को जोड़ा जाए।
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सामुदायिक सहभागिता – स्थानीय निकाय, विद्यालय और नागरिक संगठन मिलकर जागरूकता बढ़ाएँ।
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वित्तीय प्रोत्साहन – हरित कर और उत्सर्जन व्यापार प्रणाली लागू की जाए।
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पारदर्शिता और जवाबदेही – अनुपालन रिपोर्टों को सार्वजनिक किया जाए और नागरिक निगरानी बढ़ाई जाए।
परीक्षा हेतु महत्त्व
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
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राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई।
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वर्ष 2024 से 2025 तक पीएम 10 और पीएम 2.5 में बीस से तीस प्रतिशत कमी का लक्ष्य रखा गया।
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वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की स्थापना वर्ष 2020 में हुई।
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भारत स्टेज 6 मानक वर्ष 2020 से लागू हुए।
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अनुच्छेद 48A और 51A(g) 42वें संविधान संशोधन से जोड़े गए।
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राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक वर्ष 2015 में प्रारंभ हुआ।
मुख्य परीक्षा के लिए बिंदु
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भारत की पर्यावरण नीति और जनस्वास्थ्य के बीच सम्बन्ध का विश्लेषण करें।
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राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान की प्रभावशीलता पर चर्चा करें।
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भारत में पर्यावरणीय कानूनों के अनुपालन अभाव के कारणों की विवेचना करें।
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वायु गुणवत्ता सुधार हेतु संस्थागत सुधार प्रस्तावित करें।
साक्षात्कार के लिए विचार बिंदु
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नागरिक सहभागिता से वायु प्रदूषण नियंत्रण कैसे सुधारा जा सकता है।
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उद्योग और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच नीति संतुलन कैसे बनाया जा सकता है।
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एक प्रशासक के रूप में आप अपने जिले में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को कैसे लागू करेंगे।
संक्षेप में
वायु प्रदूषण केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि भारत की विकास और स्वास्थ्य नीति की चुनौती है। नीतियाँ बन चुकी हैं, अब आवश्यकता है सख्त अनुपालन, बहु राज्यीय समन्वय और नागरिक जिम्मेदारी की ताकि हर भारतीय को स्वच्छ वायु का अधिकार मिल सके।
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