परिचय
भारत आज अपने विकास पथ के एक ऐसे महत्वपूर्ण दौर में है जहाँ छोटे निर्णय बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। बदलते वैश्विक समीकरण, आर्थिक अस्थिरता और तकनीकी परिवर्तन ने भारत के नीति ढांचे को नई दिशा दी है। यह दौर संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों की पुनः पुष्टि का समय भी है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ
स्वतंत्रता के बाद भारत ने योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा। इक्कीसवीं सदी में डिजिटल भारत, मेक इन इंडिया, और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने विकास को नई दिशा दी। कोविड-19 महामारी के बाद के दौर ने दिखाया कि भारत कल्याण और सुधार को एक साथ आगे बढ़ा सकता है। आज जब विश्व जलवायु संकट, भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है, भारत की नीतियाँ उसकी वैश्विक भूमिका को परिभाषित कर रही हैं।

वर्तमान परिदृश्य
2025 तक भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और इसकी वृद्धि दर लगभग 6.5 से 7 प्रतिशत के बीच अनुमानित है। भारत डिजिटल सेवाओं, हरित ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बन रहा है। परंतु वैश्विक स्तर पर तनाव, ऊर्जा संकट और आपूर्ति शृंखला में बदलाव भारत के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
2023 में जी20 अध्यक्षता ने भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत किया। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना, पीएम गति शक्ति और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसी नीतियाँ भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। फिर भी मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और राजकोषीय असंतुलन जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

सरकारी नीतियाँ और विधिक प्रावधान

  1. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन – स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को अग्रणी बनाने का प्रयास।

  2. डिजिटल इंडिया और इंडिया स्टैक – समावेशी शासन और वित्तीय पहुँच का विस्तार।

  3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 – ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के लिए मानव संसाधन विकास।

  4. मिशन लाइफ – टिकाऊ जीवन शैली और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता।

  5. मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत – घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन।

  6. संविधान के अनुच्छेद 38 और 39 – सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में राज्य की जिम्मेदारी।

  7. सेमीकंडक्टर मिशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता नीति – तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर कदम।

चुनौतियाँ और समस्याएँ

  1. आर्थिक असमानता – शहरी और ग्रामीण आय में बड़ी खाई बनी हुई है।

  2. रोजगार सृजन – स्वचालन और वैश्विक मंदी के कारण सीमित अवसर।

  3. जलवायु परिवर्तन – कृषि, ऊर्जा और संसाधनों पर गंभीर प्रभाव।

  4. भू-राजनीतिक जटिलता – प्रमुख शक्तियों के बीच संतुलन बनाना कठिन।

  5. संस्थागत सुधार – नीति क्रियान्वयन में देरी और वित्तीय अनुशासन की कमी।

  6. सामाजिक एकता – क्षेत्रीय असमानता और डिजिटल विभाजन नई सामाजिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं।

आगे की राह
भारत को सुधार, नवाचार और सामंजस्य पर आधारित विकास मॉडल अपनाना चाहिए। उच्च मूल्य वाले विनिर्माण, डिजिटल अवसंरचना और मानव पूंजी में निवेश प्राथमिकता होनी चाहिए। संघीय सहयोग और पारदर्शी शासन नीति स्थिरता सुनिश्चित करेंगे। हरित ऊर्जा, शहरी नियोजन और वित्तीय नवाचार के माध्यम से जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। वैश्विक स्तर पर भारत को बहुपक्षीय संस्थानों में सक्रिय भागीदारी और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करना चाहिए।

परीक्षा हेतु महत्त्व

प्रिलिम्स हेतु तथ्य

  1. जी20 अध्यक्षता वर्ष – 2023

  2. राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन – 2021

  3. मिशन लाइफ – COP27 के दौरान प्रारंभ

  4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 2020

  5. पीएलआई योजना – 14 प्रमुख क्षेत्रों में

  6. पीएम गति शक्ति – 2021

  7. भारत की जीडीपी रैंक – विश्व में पाँचवीं (आईएमएफ अनुमान 2025)

  8. अनुच्छेद 38 – राज्य नीति के निदेशक तत्वों से संबंधित

मुख्य परीक्षा हेतु बिंदु

  1. वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की आर्थिक दृढ़ता का मूल्यांकन करें।

  2. सतत विकास में प्रौद्योगिकी मिशनों की भूमिका पर चर्चा करें।

  3. जलवायु और विकास के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर विश्लेषण करें।

  4. बहुध्रुवीय विश्व में भारत की विदेश नीति का मूल्यांकन करें।

  5. क्षेत्रीय विकास असमानता को कम करने के उपाय सुझाएँ।

साक्षात्कार हेतु विचार

  1. भारत की वृद्धि समावेशी और टिकाऊ दोनों होनी चाहिए।

  2. प्रौद्योगिकी सुशासन का उपकरण है, उसका विकल्प नहीं।

  3. नवाचार से जलवायु उत्तरदायित्व और आर्थिक लक्ष्य दोनों पूरे हो सकते हैं।

  4. भारत की कूटनीतिक सॉफ्ट पावर वैश्विक मंच पर उसकी प्रमुख ताकत है।

संक्षेप में
2025 में भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। उसकी नीति दिशा यह तय करेगी कि वह विकास और न्याय, तकनीक और पर्यावरण, तथा राष्ट्रीय हित और वैश्विक जिम्मेदारी के बीच कितना संतुलन स्थापित कर सकता है।