परिचय
भारत में तीव्र शहरीकरण ने स्थिरता, समावेशन और जलवायु-सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियाँ पैदा की हैं। “इको-प्रेकेरियट” शब्द उन असंगठित शहरी मजदूरों और समुदायों को संदर्भित करता है जिनकी आजीविका पर्यावरणीय क्षरण और जलवायु संकट से सीधे प्रभावित होती है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे शहरों में बढ़ते ताप-प्रवाह, बाढ़ और प्रदूषण ने करोड़ों लोगों के जीवन को असहनीय बना दिया है। यह विषय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण) से सीधे जुड़ा है, जो राज्य पर जीवनयोग्य वातावरण सुनिश्चित करने का दायित्व डालते हैं।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
“प्रेकेरियट” शब्द वैश्वीकरण के युग में असुरक्षित मजदूर वर्ग के लिए प्रयुक्त हुआ। “इको-प्रेकेरियट” इसका विस्तार है, जिसमें पर्यावरणीय असुरक्षा झेलने वाले शहरी गरीब शामिल हैं। औपनिवेशिक काल और औद्योगिक योजनाओं के दौर में भारत के शहरों का विकास पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी करते हुए हुआ। स्वतंत्रता के बाद शहरी नीतियाँ आर्थिक विकास पर केंद्रित रहीं। 74वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992) ने स्थानीय निकायों को सशक्त किया, किंतु पर्यावरणीय पक्ष पीछे रह गया।
आज असंगठित क्षेत्र के मजदूर, झुग्गी निवासी, स्वच्छता कर्मी और निर्माण श्रमिक इस इको-प्रेकेरियट का चेहरा हैं। वे प्रदूषित नदियों, कूड़ा-ढेरों या जलभराव वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य और रोजगार दोनों संकट में रहते हैं।

वर्तमान परिदृश्य
आईपीसीसी और नीति आयोग की रिपोर्टों के अनुसार भारत के कई शहर जलवायु-संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। दिल्ली की वायु गुणवत्ता प्रायः 400 से अधिक रहती है, जबकि चेन्नई और मुंबई में बार-बार शहरी बाढ़ आती है। विश्व बैंक (2023) का अनुमान है कि 2030 तक जलवायु परिवर्तन से 5 करोड़ भारतीय गरीबी में धकेले जा सकते हैं।
शहरी सीवेज का लगभग 70 प्रतिशत अब भी अनुपचारित रहता है, भूजल तेजी से घट रहा है और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अपर्याप्त है। रिक्शा चालकों, ठेला-विक्रेताओं, कूड़ा-छांटने वालों और निर्माण मजदूरों को अत्यधिक गर्मी, विषैली हवा और अस्थिर आय का सामना करना पड़ता है। ये स्थितियाँ अव्यवस्थित शहरीकरण और जलवायु उपेक्षा की मानवीय कीमत को दर्शाती हैं।

सरकारी नीतियाँ एवं कानूनी प्रावधान
भारत में कई संवैधानिक और नीतिगत उपाय लागू हैं।

  • अनुच्छेद 21 – स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार

  • अनुच्छेद 48A और 51A(g) – पर्यावरण संरक्षण का दायित्व

  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (2008) – सतत आवास मिशन सहित आठ मिशन

  • अमृत मिशन, स्मार्ट सिटी मिशन, स्वच्छ भारत मिशन – शहरी बुनियादी ढांचे में सुधार

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 – कानूनी सुदृढ़ता
    फिर भी क्रियान्वयन स्तर पर कमजोरियाँ बनी हुई हैं और हाशिए के समुदायों की भागीदारी सीमित है।

चुनौतियाँ एवं समस्याएँ

  1. कमजोर शहरी शासन – निकायों की क्षमता, समन्वय और जवाबदेही की कमी।

  2. असंगठित श्रमिकों की अनदेखी – नीति-निर्माण में उनका प्रतिनिधित्व नहीं।

  3. ढांचागत असमानता – संपन्न क्षेत्रों में निवेश, गरीब बस्तियाँ उपेक्षित।

  4. जलवायु-प्रेरित प्रवासन – बाढ़, सूखा या गर्मी से विस्थापन बढ़ रहा है।

  5. डेटा और भागीदारी की कमी – जलवायु-जोखिम का समुचित आकलन नहीं।

  6. स्वास्थ्य संकट – प्रदूषण से गरीब समुदाय अधिक प्रभावित।

आगे की राह

  • 74वें संशोधन के अनुरूप स्थानीय निकायों को वित्तीय और कार्यात्मक अधिकार देना।

  • जलवायु-सहिष्णु योजना में झुग्गी बस्तियों और असंगठित वर्ग की भागीदारी।

  • हरित रोजगार और कौशल विकास को बढ़ावा देना।

  • अमृत, स्मार्ट सिटी और स्वच्छ भारत मिशनों का समन्वित क्रियान्वयन।

  • शहरी मास्टर प्लान में जलवायु-अनुकूल दृष्टिकोण शामिल करना।

  • डेटा-आधारित शासन और नागरिक डैशबोर्ड प्रणाली विकसित करना।

परीक्षाओं हेतु महत्व

प्रारंभिक परीक्षा हेतु

  1. 74वां संविधान संशोधन अधिनियम – 1992

  2. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना – 2008

  3. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम – 1986

  4. अमृत मिशन – 2015

  5. स्मार्ट सिटी मिशन – 2015

  6. स्वच्छ भारत मिशन – 2014

  7. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम – 2010

  8. अनुच्छेद 48A – पर्यावरण संरक्षण

मुख्य परीक्षा हेतु

  1. इको-प्रेकेरियट समावेशी शहरी शासन की विफलता को दर्शाता है।

  2. सहभागी योजना और विकेंद्रीकरण सतत शहरीकरण की कुंजी है।

  3. हरित रोजगार सृजन से आर्थिक विकास और पारिस्थितिक न्याय दोनों संभव।

  4. शहरी गरीबी उन्मूलन और जलवायु अनुकूलन का समन्वय आवश्यक।

  5. उदाहरण – 2015 चेन्नई बाढ़ और दिल्ली प्रदूषण संकट।

साक्षात्कार हेतु

  1. सतत शहरीकरण का केंद्र नागरिक होने चाहिए, केवल ढांचा नहीं।

  2. जलवायु न्याय का अर्थ है कमजोर वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

  3. इको-प्रेकेरियट की अवधारणा आजीविका और पर्यावरण को एकीकृत दृष्टि से देखती है।

  4. जीवनयोग्य शहर संविधान के गरिमा और समानता मूल्यों का प्रतीक हैं।

संक्षेप में
भारत के असहनीय शहरों में इको-प्रेकेरियट का संघर्ष यह दर्शाता है कि समावेशी और जलवायु-संवेदनशील शहरी शासन अब अत्यावश्यक है। स्थिरता और समानता का समन्वय ही विकास का सही मार्ग है।