प्रस्तावना
एंटीबायोटिक प्रतिरोध आज सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक है। भारत जैसे देश में, जहाँ एंटीबायोटिक का उपयोग और उत्पादन दोनों ही बड़े पैमाने पर होता है, यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। ऐसे में स्वदेशी एंटीबायोटिक का विकास न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए आवश्यक है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से भी जुड़ा हुआ है। संविधान के अनुच्छेद 47 में राज्य को जनता के स्वास्थ्य सुधार का दायित्व सौंपा गया है, इसलिए यह विषय राष्ट्रीय नीति और विकास दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
बीसवीं सदी में एंटीबायोटिक ने चिकित्सा जगत में क्रांति ला दी, लेकिन इनका अत्यधिक और अनुचित उपयोग एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध यानी AMR का कारण बना। भारत में बिना नुस्खे के दवाएँ उपलब्ध होना, आत्म-चिकित्सा और जागरूकता की कमी इस समस्या को बढ़ा रही हैं। पहले भारत विदेशी दवाओं और कच्चे पदार्थों पर निर्भर था, लेकिन अब देश ने अपने फार्मास्युटिकल अनुसंधान को सशक्त करने के लिए कदम उठाए हैं।
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI Scheme), राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NIPER), और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की पहलें इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। 2017 में भारत ने राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध कार्य योजना लागू की, जिसमें अनुसंधान, निगरानी और जागरूकता को प्राथमिकता दी गई। स्वदेशी एंटीबायोटिक विकास इसी नीति का एक महत्वपूर्ण अंग है जो भारत को आयात पर निर्भरता से मुक्त करते हुए स्थानीय रोगजनकों के अनुकूल नई दवाओं के निर्माण पर बल देता है।
वर्तमान परिदृश्य
भारत का औषधि उद्योग उत्पादन की दृष्टि से विश्व में तीसरे स्थान पर है, लेकिन नए एंटीबायोटिक अणुओं के अनुसंधान में अभी भी सीमित प्रगति हुई है। अधिकांश एंटीबायोटिक पुराने जेनेरिक स्वरूप में उपयोग किए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) ने मिलकर स्वदेशी अनुसंधान कार्यक्रम शुरू किए हैं।
2024 में ICMR ने भारतीय स्टार्टअप कंपनियों के साथ साझेदारी कर संकीर्ण प्रभाव वाले नए एंटीबायोटिक विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो क्लेब्सिएला और ई.कोलाई जैसे प्रतिरोधी जीवाणुओं पर प्रभावी होंगे। इसके साथ ही राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध निगरानी नेटवर्क (NARS-Net) का विस्तार किया गया है। सरकार “वन हेल्थ” दृष्टिकोण के तहत मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एकीकृत कर रही है ताकि प्रतिरोध के स्रोतों को समग्र रूप से नियंत्रित किया जा सके।
सरकारी नीतियाँ और कानूनी प्रावधान
-
राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध कार्य योजना 2017।
-
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) दवाओं के अनुमोदन और बिक्री को नियंत्रित करता है।
-
औषधि और प्रसाधन नियमों में अनुसूची H1 के तहत कुछ दवाओं की बिना नुस्खे बिक्री पर प्रतिबंध।
-
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना 2020 के तहत एपीआई निर्माण को बढ़ावा।
-
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहन।
-
संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को जनता के स्वास्थ्य सुधार का दायित्व देता है।
मुख्य चुनौतियाँ
-
एंटीबायोटिक अनुसंधान में सीमित निवेश और निजी क्षेत्र की कम रुचि।
-
कच्चे पदार्थों के आयात पर निर्भरता जिससे आपूर्ति अस्थिर रहती है।
-
नियामक प्रक्रियाओं में देरी जिससे नवाचार प्रभावित होता है।
-
जनता में एंटीबायोटिक के उचित उपयोग के प्रति जागरूकता की कमी।
-
प्रतिरोध निगरानी के लिए पर्याप्त डेटा और अवसंरचना का अभाव।
-
स्वास्थ्य, पशुपालन और पर्यावरण विभागों के बीच समन्वय की कमी।
आगे की राह
-
स्वदेशी अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी फंडिंग और सहयोग बढ़ाना।
-
सार्वजनिक क्षेत्र के अनुसंधान संस्थानों जैसे ICMR और NIPER को नए अणुओं के अनुसंधान के लिए सशक्त बनाना।
-
जैव प्रौद्योगिकी विभाग और BIRAC के माध्यम से स्टार्टअप और नवाचार को प्रोत्साहित करना।
-
NARS-Net का विस्तार ग्रामीण अस्पतालों और निजी प्रयोगशालाओं तक करना।
-
समुदाय स्तर पर एंटीबायोटिक उपयोग पर जनजागरूकता अभियान चलाना।
-
वन हेल्थ दृष्टिकोण के अंतर्गत पशु और कृषि क्षेत्र को जोड़ना।
परीक्षा हेतु महत्व
प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य
-
राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध कार्य योजना 2017 में शुरू।
-
औषधि सुरक्षा और लाइसेंसिंग – CDSCO।
-
अनुसूची H1 नियम – 2014 से लागू।
-
ICMR और DBT – प्रमुख अनुसंधान सहयोगी संस्थाएँ।
-
NARS-Net – 35 से अधिक संस्थानों से जुड़ा नेटवर्क।
-
PLI योजना – 2020 में आरंभ।
-
अनुच्छेद 47 – स्वास्थ्य सुधार का राज्य का कर्तव्य।
-
NIPER – 1998 में स्थापित फार्मास्युटिकल अनुसंधान संस्थान।
मुख्य परीक्षा हेतु विश्लेषणात्मक बिंदु
-
एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध एक सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों की चुनौती है।
-
स्वदेशी अनुसंधान आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
-
वन हेल्थ दृष्टिकोण प्रतिरोध नियंत्रण के लिए समग्र समाधान प्रदान करता है।
-
नियामक नियंत्रण और जनजागरूकता एंटीबायोटिक दुरुपयोग को घटा सकते हैं।
-
नवाचार को सस्ती और सुलभ चिकित्सा से जोड़ना आवश्यक है।
-
उदाहरण – ICMR द्वारा 2024 में स्वदेशी एंटीबायोटिक विकास के लिए स्टार्टअप सहयोग।
साक्षात्कार हेतु बिंदु
-
स्वदेशी एंटीबायोटिक आत्मनिर्भरता और नवाचार का प्रतीक हैं।
-
एंटीबायोटिक के उचित उपयोग से ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षित रह सकता है।
-
वन हेल्थ दृष्टिकोण मानव और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को जोड़ता है।
-
नवाचार और सुलभता के बीच संतुलन आवश्यक है।
संक्षेप में
स्वदेशी एंटीबायोटिक विकास भारत के स्वास्थ्य सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। अनुसंधान को प्रोत्साहन, जागरूकता और नियामक नियंत्रण के माध्यम से भारत न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एंटीबायोटिक नवाचार का नेतृत्व भी कर सकता है।
Comments (0)
Leave a Comment